October 21, 2013

बोलने के अवसर सृजित (Create) करें . . . !

एक बार हकलाने वाले एक दोस्त से बातचीत हो रही थी। उन्होंने बताया कि टीसा की वर्कशाप में शामिल होने पर हम बहुत कुछ सीख जाते हैं, लेकिन हकलाने के बारे में अपने शहर के लोगों से बातचीत करना थोड़ा अजीब लगता है, हिम्मत ही नहीं होती। अपने मित्र की इस बात पर मैंने भी सहमति व्यक्त की।

बाद में चिंतन किया कि ऐसा क्यों होता है? हम अपने ही शहर में, अपने ही लोगों से हकलाहट पर बातचीत करने से झिझकते हैं। जो लोग हमें अच्छी तरह से जानते हैं, उन लोगों से भी हकलाहट पर खुलकर चर्चा करना अरूचिकर पाते हैं। हमारे पास बोलने के ढेरों अवसर मौजूद होते हुए भी उनका इस्तेमाल नहीं कर पाते।



मेरी समझ में हम हकलाहट के डर से पूरी तरह उबर नहीं पाते। हकलाहट को लेकर चिंता रहती है कि लोग क्या कहेंगे? कई बार हम खुद ब खुद अपनी सीमाएं तय कर लेते हैं। जैसे - अपने बास से हकलाहट पर चर्चा करना ठीक नहीं, किसी अनजान युवती से बात करने पर पता नहीं उसका रिएक्शन क्या होगा? अधिक लोगों के सामने अगर हकलाहट पर बातचीत की तो वे हंसेगे? कोई हमारी बात को महत्व देगा भी या नहीं? कहीं कोई हकलाहट को सुनकर हमारा मजाक न बनाए? ये सभी सवाल हमें कुरेदते रहते हैं।



हमारी व्यस्त दिनचर्या में हर दिन कई सुन्दर अवसर आते हैं जब हम खुलकर हकला सकते हैं, लोगों से हकलाहट के बारे में अपनी बातें साझा कर सकते हैं, लेकिन फिर वही हकलाहट का डर हावी होने लगता है। शर्म का समुन्दर हमें अपने आगोश में लेने को उतारू रहता है।


वास्तव में हम अपने रास्ते खुद बंद करते जाते हैं। अवसरों को सीमित या खत्म करते हैं। अगर आप अपनी दिनचर्या पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि हर दिन आपको लोगों से बात करने के कई मौके मिल सकते थे। खरीददारी करना, फोन पर बात करना, लोकल बस में सफर के दौरान साथ वाली सीट पर बैठे व्यक्ति से बातचीत करना आदि।


एक बार मैं भोपाल में लोकल बस में सफर कर रहा था। मेरी पास वाली सीट पर एक बुजुर्ग व्यक्ति बैठे थे। मैंने उनसे पूछा कि आप कहां जा रहे हैं? उनका उत्तर था- ओल्ड सिटी। बस फिर धीरे-धीरे मैंने उन्हें सम्मान देकर बातचीत करना शुरू किया। कुछ देर बाद उस बुजुर्ग सज्जन ने अपना बटुआ निकाला और सुपारी काटने लगे। मुझे भी सुपारी आफर किया। दो दाने मैंने भी उठा लिए। यह सफर महज 20 मिनट का था।


बस से उतरने के बाद सोचा कि अगर मैं खुद एकदम शांत रहता, उन सज्जन से कुछ बोलता ही नहीं, तो यह तय था कि वे भी मुझसे कुछ नहीं बोलते। और बातचीत करने का कोई चांस ही नहीं था।


मैंने अपने जीवन के अनुभवों से यही सीखा कि हर बार पहल आपको ही करनी होगी लोगों से जुड़ने की। कई बार ऐसा होता है कि किसी शुभ अवसर या त्यौहार पर विचार आता है कि मैं ही हर बार लोगों को पहले शुभकामना एसएमएस क्यों करूं? कई लोग तो रिप्लाई भी नहीं करते! लेकिन फिर विचार आता है कि आगे होकर पहल करने में क्या बुराई है? अगर किसी ने रिप्लाई नहीं किया तो हो सकता है कि शायद वह व्यस्त हो, बीमार हो या उसके मोबाइल पर बैलेन्स ही नहीं हो।

कई बार हम संकोच, शर्म, डर के कारण पहल करना ही छोड़ देते हैं। यह हम हकलाने वालों के साथ ही दूसरे लोगों के साथ भी होता है। लोगों के दिल में अपनी जगह बनाने, उनसे जुड़ने के लिए हमें कोई बहुत बड़ा उपक्रम या धन खर्च करने की जरूरत नहीं है। जरूरत है सही अवसर को पहचानने की। किसी का जन्मदिन हो तो खुद आगे होकर बधाई दें, कोई पुरस्कार मिला हो तो बधाई दें। किसी ने कोई सफलता अर्जित की हो तो खुद उसे मिठाई खिलाएं, बधाई दें। वास्तव में यह सबकुछ करना बहुत आसान है। हमारे सामाजिक दायरे को बढ़ाने के लिए और बातचीत के नए अवसर पैदा करने के लिए यह जरूरी भी है।


- अमितसिंह कुशवाह,

सतना, मध्यप्रदेश।
09300939758

3 comments:

lalit said...

amit aap ke post padna bahut achha lahta hai...it feel like reading a small moral story with informations

Vijay Kumar said...

thanks Amit jee . your are saying perfectly. we are not talking about stammering openly . ham kahate hai ki hamane accept kar liyaa hai par jab logo ke beech men jaakar hakalane ke baare me baat karanaa hota hai to ham hakalane ke baare me jyaadaa baat nahee karate . maine dekhaa hai practically .

sachin said...

अमित - आप का लेख पढ़ कर मन प्रसन्न हो गया \ आपने सही विश्लेषण किया है \ और एक अर्थपूर्ण तस्वीर का भी सार्थक प्रयोग किया है।
हम सब की ओर से ढेरो बधाई और दीपावली की शुभ कामनाये !