June 26, 2013

मैं और मेरी हकलाहट . . . !

 By Anil Guhar, Baitul (M.P.)

वैसे देखा जाये तो हकलाना बचपन में ही शुरू होता है| उसी प्रकार मेरा भी
हकलाना बचपन में शुरू हो गया था सही मायने में कहा जाये की वो अटकना था
जो की आज भी जारी है| कारण कई सारे हो सकते है जैसे हर बच्चे आपस में
ऊँचे स्थान से कूदना कूदना खेलते है उसी प्रकार में भी खेल रहा था किसी
बस उसी टाइम बात करते करते दांतों बीच जीभ आ गयी और और अगला हिस्सा पर कट
लग गया था ऐसा घर वाले कहते है|
वह जल्द ही कुछ समय के बाद ठीक हो
गयी| ऐसा उनका मानना है| पर अगर मेरा अटकना जीभ कटने की वजह से हुआ होता
तो क्या मैं अकेले में प्रेक्टिस के लिए पेपर पढ़ते समय या स्पीच
प्रेक्टिस करते समय मुझे अटकना चाहिए पर में उस टाइम में नहीं अटकता हूँ|
तो इससे साबित होता है की ये कारण भी नहीं है|
समय के साथ में और भी ज्यादा बोलना और बस बिना किसी उद्देश्य के बोलते
रहना इस आदत से मुझे हमेशा डाट सुननी पड़ती थी| इस प्रकार मेरा बचपन
गुजरता रहा| शायद यही वजह थी मेरी अटकने की यानि बार बार ज्यादा या
उद्देश्यहीन बोलने के लिए डाटना | फिर लगने लगा की में हमेशा ही गलत
बोलता हू| कांफिडेंस कम होने की शुरुआत हुई|
   फिर किशोरावस्था आई उस टाइम में लोगो में घुलने- मिलने में बहुत
दिक्कत होती थी अटकना तो था पर पर उनके साथ बातचीत करने में बहुत दिक्कत
होती थी| शायद कारण हो सकता है, अटकने की वजह से घर में ही रहना शुरू कर
दिया था मैंने यही वजह थी की सामाजिक मेल जोल का आभाव हो गया था| स्कूल
में नंबर हमेशा अच्छे आते थे| पर जैसे अटकने की की आदत बड़ते गयी वैसे
वैसे मैं स्कूल के आलावा बाकि समय घर पर ही गुजारने लगा| मेरा साथी टीवी
या पुस्तके ही होती जो भी पुस्तक हाथ लगती उसे पढ़ता रहता| इस प्रकार समाज
से और कटते चला गया| जीवन की मुलभूत जरूरते ३ मानी गयी है जैसे रोटी कपड़ा
और मकान पर इसके आलावा चौथी चीज भी होती है जो है अभिव्यक्ति| जो मन में
हो या जो हम चाहते है हम लोगो को कुछ बताना है, अगर वह अगर मन को हल्का
नहीं किया जाये तो अंदर ही अंदर डिप्रेशन जैसे स्थिति में हम पहुचने लगते
है| इस समय मेरा एजुकेशन परफार्मेंस कम होता चला गया| मैंने बी कॉम के
दौरान पार्ट टाइम जॉब भी किया| जिससे मेरी सामाजिक समझ बढ़ती रही| इसी समय
मैंने कम्प्यूटिंग अकाउंटिंग टैली प्रोग्राम का कौर्स किया जिससे अच्छी
जगह जॉब भी मिली| पर मन नहीं लगा| उसके बाद एजुकेशन एंड करियर काउंसलिंग
एमपीऑनलाइन कीओस्क फर्म में मैंने अकाउन्टिंग और डाटाबेस कीपर की जॉब की
जहा ये फिल्ड अच्छा लगा|  एमपीऑनलाइन कीओस्क एमपी में सरकार और नागरिको
के सुविधा केन्द्र के ऑनलाइन वर्क के लिए लायसेंस दिए गए थे जिसमे जितने
भी एमपी स्टेट के वेकेन्सी के ऑनलाइन फॉर्म भी केवल इन्ही के माध्यम से
ही भरे जा सकते है. इस प्रकार यह बिजनेस में अच्छा पैसा था| कभी कभी बोंस
के नहीं रहते में कुछ समय के लिए सर्विस संभालनी पड़ती थी| पर उस टाइम में
 कभी कभी या कुछ अक्षरों या शब्दों पर अटक जाना बहुत अखरता था,  होता था,
उसे कहने में बहुत जोर लगाकर कहना पड़ता था| इसके बाद और अनुभव के लिए
दूसरी फर्म में जॉब किया जिससे इस फिल्ड का अच्छा खासा अनुभव हो गया था|
अपना और बड़ा करने की इच्छा थी तो इस फिल्ड में उतरने का मन बनाया| पर
इसमें बोलना और अच्छे से बोलने की ज्यादा जरुरत वाला काम था| और मैं
बोलते बोलते अटक जाया करता था यह बहुत बुरा लगता था| मैंने कभी अटकने की
समस्या को ठीक करने के बारे में ज्यादा सीरियस नहीं हुआ था, बस हमेशा
अटकने या अपनी बात को सामने वाले को नहीं समझा पाने पर बहुत बुरा लगता
था| इन्टरनेट के टच में तो था ही| तो मैंने इस बारे में सर्च करना शुरू
किया| कुछ स्पीच थेरेपिस्टो का पता लगा मैंने बहुत समय इन्टरनेट सर्च पर
गुजारा थेरेपिस्टो के बारे में कंटेन्ट पढ़ना और यूट्यूब पर वीडियो को
देखना| जिससे मुझे स्टेमरिंग के बारे में समझ बढते चली गयी| बहुत से फोन
पर बाते भी की| कुछ पाजिटिव लगने पर उनसे में मिलने भी गया| पर वो नहीं
मिला जिस चीज की जरुरत थी इसे ठीक कर देने की उनके द्वारा बताये गए या
सिखाए गए थेरेपी मुझे केवल बैसाखी पकड़कर चलने के जैसे लगता था| मुझे अपने
पैरों पर खड़े होना था चलना था और दौडना था, और बिजनेस में जो बोलने में
कांफिडेंस रहता है उसी की तूती बोलती है|
  एक दिन मैंने टीसा के परमिन्दर सिंह बुंदेला जी से मेरी बात हुई|
उन्होंने मुझे टीसा के बारे में बताये और अपना हाथ जगन्नाथ नाम की पीडीऍफ़
बुक दी| जिसे मैंने पूरी पढ़ा| उस समय मुझे एहसास हुआ की मेरी  कुछ बेसिक
बातों पर अमल किये जाये और अपने आप को जाना जाये की में किस कारण से
हकलाता हू| इस सम्बन्ध में दो मत है १ यह १००% जेनेटिक है और२ ये
सायक्लोजिकल है| मेने यह पाया की बोलने का डर हर किसी में होता है अगर ये
कुछ ज्यादा स्तर तक हो जाये टो हकलाने या अटकने का रूप ले लेता है| और
मेरा ऐसा मानना है की ये सायक्लोजिकल है अगर कोई बच्चा बचपन से किशोर
अवस्था तक हकलाता है पर युवा अवस्था में ठीक हो जाता है ऐसा मेरा अनुभव
है मैंने इन सालो में बहुत रिसर्च किया हू कई इसे लोग मेरे सामने आये
जो पहले बहुत हकलाते थे पर आज वे लगभग ठीक है| अगर बहुत ध्यान से दखा
जाये तो समझ आता है की वह थोडा सा अटकते है पर सामान्यतः शून्य%|
    पीडीऍफ़ पढ़ने के बाद में लगा की जिस चीज की जरुरत है मुझे वो टीसा में
मिल सकती है, में फिर टीसा के ब्लोग्स और फेसबुक नियमित रूप से पढ़ने लगा|
वेबसाइट के माध्यम से पता लगा की अप्रेल२०१३ में देहरादून हरबर्टपुर में
वर्कशॉप होने वाली है|मैंने हेमंत जी अमित जी और सचिन सर से संपर्क किया|
रिजर्वेशन करवाया| सफर में मुझे देल्ही में अमित जी मिले उनसे टीसा के
बारे में कई सारी बात हुई|सफर बहुत सुहाना था देल्ही के आगे देहरादून तक
का सफर  के दृश्य बहुत अच्छे थे| पर सफर में सुबह ठण्ड बहुत लगी जो हमारे
बेतुल में अपेक्षा बहुत थी|
  हरबर्टपुर पहुचे | वह हम करीब आधा घंटा लेट हो चुके थे| वह पहुचकर सचिन
सर और हमने अभिवादन किये| हॉल में सचिन सर और बहुत सारे स्टेमर करने वाले
लोग थे| ३दिन का एजेंडा बताया गया की हमें क्या क्या करना है| बोउनसिंग
पव्जिंग, और प्रोलोंगेशन के बारे में बताया गया| ये सब बाते जनता था पर
कभी इतना व्यावहारिक रूप से नहीं बताया गया था कभी| वोर्क्शोप में आये
हुए लोगो ने अपने अनुभव शेयर किये| स्टेमरिंग पर सचिन सर और वह आये लोगो
से बहुत कुछ जानने का मौका मिला| मैंने पाया की जब हम शांति के साथ बिना
जल्दबाजी किये बोलते है तो हम बोल बिना अटके बोल पाते है| मैंने पाया की
हम इसलिए नहीं बोल पते है क्योकि हम हमारे स्पीच आर्गनस पर पूर्ण
नियंत्रण नहीं रख पाते है| और
  मैंने पाया की मेरा अटकना में लो कोंफीडेंस और बोलने से पहले ही अटकने
का डर हावी होने लगता था| झिझक होती थी की बोला और अटक गया तो क्या होगा|
लोग क्या सोचेंगे| फिर इतना सारा सोच लिए तो फिर बोल खाक पाएंगे| फिर
मुझे पता लगा की  हकलाना एक हिमशैल की तरह है. सतह से ऊपर, लोगों को क्या
दिखता और सुनाई पड़ता है - वह वास्तव में समस्या का बहुत छोटा हिस्सा है.
जो वास्तव में बड़ी समस्या है, वह है - शर्म, डर, ग्लानि, तथा वह सभी अन्य
नकारात्मक भावनाएं जो हमारे अवचेतन मन में बैठ जाती है, जब हम एक साधारण
वाक्य बोलने की कोशिश करते हैं और नहीं बोल पाते ।

अब मुझे पता लग गया था की हकलाना एक डर झिझक आदि है| इसे अपने ऊपर
नियंत्रण रख कर साफ स्पष्ट और बिना अटके कह सकते है| अगर फिर भी अटकते है
तो ३ टेक्निक का प्रोयोग करके ब्लोक से बाहर आ सकते है| हम हकलाने वाले
लोग समझते है की हम अपने हकलाने को अधिकतर लोगो के सामने छुपाने के लिए
जो प्रयास करते है वो सफल नहीं होते है बल्कि उनसे और प्रेशर पड़ता है
हमारी ये छुपाने की आदत बुरी है| अगर लोगो के सामने अटक रहे हो और
स्वीकार कर लो की में अटकता हू|   अब जब भी में लोगो के सामने अटक जाता
हू तो हँसते हुए साफ साफ कह देता हू कभी कभी अटक जाता हू| अच्छा लगता है
मन हल्का हो जाता है| मैंने टीसा से पाया की लोगो को ज्यादा फर्क नही
पड़ता की आप अटकते है सामने वाले को तो अपने कम से मतलब होता है| असली
मुद्दा कम्न्युकेशन होता है. धाराप्रवाह नहीं बोल पाए तो भी कम चल जाता
है| मैंने जाना की हम उस कस्तूरीमृग की तरह हो गए है की उपाय तो हमारे
अंदर ही है और हम उसे बाहर ढूंढ रहे है|
 मैं अब रोज योग और ध्यान करता हू| जब भी उचित मौका मिले जरुर लोगो से
बाते करता  रहता हू| हकलाने का में सबसे बड़ा उपाय मानता हू की लोगो से
बाते करो जितना बोलने का अभ्यास करेंगे उतना ही हमारे अटकने की समस्या
दूर होते जाएँगी| मन का डर निकलता जायेंगा| वर्कशाप से आने के बाद में
मेरे अटकने में बहुत ज्यादा कमी आई है| अब में बिना अटके बोल सकता हू|
शायद ही कुछ ही मामलो में अटकता हू|
हकलाने को नियंत्रित करना आसान है पर उनके जो नियम या तरीके है उनको
व्यवहारिक रूप से उपयोग किया जाये तो हकलाने पर नियंत्रण हो जाता है|
मुझे अब विश्वाश हो चूका है की एक दिन में से हकलाने पर पूरी तरह
नियंत्रण कर लूँगा|
मुझे टीसा से जोकुछ जानने मिला वो उसके लिए में बहुत आभारी हू|


- अनिल गुहार, बैतूल

3 comments:

Amitsingh Kushwah said...

बहुत सुंदर अनिल। अपने अनुभव साझा करने के लिए धन्यवाद।

sachin said...

Dhanyavad Anil..
Aapne bahut bariki se sab kuchh bayan kiya hai..

हेमन्त कुमार "हृदय" said...

अनिल जी, इस विस्तृत - रुचिकर लेखन के लिये बहुत बहुत आभार ।
सत्य लिखा आपने TISA की just एक कार्यशाला ही, हकलाहट के प्रति नजरिया बदल देती है और नजरिया (internal Mindset) बदलते ही नजारे (outer world) अपने आप बदल जाते हैं ।
आपका ये पोस्ट उन लोगो को भी प्रेरित करेगा जो TISA के सिर्फ़ Blog पढते हैं लेकिन किसी कार्यशाला workshop मे भाग नहीं लेते ।