November 1, 2012

Delhi SHG Report 28.10.12

नमस्कार दोस्तों,


आज (28/10/2012) जब मैं आज SHG मीटिंग के वेन्यु पर पंहुचा तो मुझे आश्चर्य हुआ की आज कोई भी उपस्थित नहीं था. थोड़ी देर तक मैं यूँ ही बैठकर सोचता रहा की ऐसा कैसे हो सकता है की कोई भी व्यक्ति न आये!!
 सिकंदर और सचिन सर कहतें हैं की किसी विशेष परिश्थिति में खुश होना या निराश होना ये सब हमारे अपने हाथ में होता है ना की आटोमेटिक. अतः मैंने निराशा का भाव छोड़कर ख़ुशी मन से उन एक्टिविटीज के बारे में सोचने लगा जिन्हें मै अकेला भी कर सकता था. आज मैंने पहली और लास्ट एक्टिविटी "स्टेमरिंग सर्वे" की.  मैंने तय कर लिया था की इस वक़्त मै जितना हकला सकता हूँ हक्लौंगा (बेझिझक और खुलकर), लोगों के आँखों का रंग लगातार देखता रहूँगा (eye contact), और जीतनी भी स्पीच से सम्बंधित टेक्निक्स मुझे मालूम है उनका उपयोग करने की कोशिश करूँगा.  इसके बाद मैंने लोगों से बात करना शुरू कर दिया.  जब मैंने पहले व्यक्ति से बात करने की कोशिश की तो इतना ब्लॉक्स के कारण मुझे निराश होने लगी, लेकिन मैंने हार नहीं मानी और दोबारा कोशिश की, किसी तरह तीन लोगों से बात की उसके बाद मेरे अन्दर निराशा का लेवल काफी बढ़ चुका था, फिर भी मैंने आपको शांत किया और दोबारा कोशिश शुरू की.  प्रेमचंद की एक कोटेशन है "सच्चे खिलाडी कभी रोते नहीं बाजी पर बाजी हारतें हैं, चोट पर चोट खातें हैं, धक्के पर धक्के सहतें हैं. पर मैदान में डटें रहतें हैं, उनकी त्योरियों पर बल नहीं पड़ते." उसके बाद मैंने लगभग दस लोगों से बात की ,  आज का यह टास्क मेरे लिए इतना आसान नहीं था फिर भी मैंने किया.
आज की मीटिंग का निष्कर्ष यह भी है की हमें अपनी स्पीच पर कम करने के लिए किसी बहुत बड़े ग्रुप की ज़रुरत नहीं होती. ऐसी अनेकों एक्टिविटीज हैं जिन्हें हम अकेले भी कर सकतें हैं. शायद इसीलिए कहा जाता है "अपना हाथ जगन्नाथ".  "अपना हाथ जगन्नाथ" अर्थात हमें किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर होने के बजाय हमें अपनी सहायता स्वयं करनी चाहिए. लेकिन ग्रुप के महत्व को किसी भी सूरत में नाकारा नही जा सकता. 
मै अपने Delhi SHG के सभी दोस्तों को अगली मीटिंग में इंतज़ार करूँगा.

धन्यवाद

भवदीय
जितेंदर गुप्ता
7503189365 
jitenderguptaa "at" gmail.com 

4 comments:

vishal gupta said...

super like !!! jitender u have done a really well job.

Abhinav said...

जितेंदर दोस्त,
आपने बहुत ही अच्छा लेख लिखा है अपने अनुभवोँ पर
ऐसी बहुत सी गतिविधियाँ हैं जो हम अकेले भी कर सकते हैं जैसे की आपने समय का सदुपयोग करते हुए लोगोँ से बात की और आँखों से संपर्क साधे रखा.
जीवन मैं बहुत से ऐसे मोड़ आते हैं जब हम निराश हो जाते हैं, कभी कभी ऐसा लगता है मानो जिंदगी से हार गए हैं, लेकिन हमे लगातार आगे बढते रहना चाहिए
मुझे मैथिलि शरन गुप्त की ये कविता याद आ रही है

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।

sachin said...

Dear Jitendra- dont be discouraged. This has happened to me too- many times. I always take a book with me- and read it, when no one is around. This has strengthened my "attitude". I no more care what the world does- or fails to do. I just go ahead and do, what I consider right.
On another note- we should also make sure that we reach out to new members in advance and ask them to SMS you before hand, whether they are coming or not.
We need to work on both sides of the coin: our attitude and reaching out to NEW members..

j jasbir singh said...

Dear Jitendra please always remember these lines from Bangla poem "Walk Alone" and get strength:

If they answer not to thy call, Walk alone, Walk alone, thy walk alone.