May 25, 2017

One big role completed😎😎

Hello friends
As a  kid when I saw people doing the role of Master of Ceremonies (or anchor) I used to think can I do this role?? Can I also speak so much in front of many people?? I was in a perplex mode then. But things have changed now. I was of the thought that first I should get rid of my stammering "COMPLETELY", then only I would do this. But as I said things and thoughts have now changed.

I joined Toastmasters Club a few months ago and I posted one of my speech also on the blog for which I got the award also (yipeeeee).

This Saturday we had our meeting and courageously I took the role of MC. For this role I need to know about each speaker as I have to introduce him/her. Also I should know the sequence of the meeting and truly speaking I was having no idea what would happen. The night before I messaged my mentor Tanuja ma'am to come early so that I can rehearse my role.

Before I go in detail, let me tell you what actually is the role of MC - introducing the speakers, introducing the role takers, deciding the theme of meeting, try to establish the link between the theme and speech, and lastly ensuring that the audience doesn't get bored...😊

I reached the venue well before time and my mentor also reached and I told her what I have in my mind regarding the role. I gathered the information about all the speakers as soon as they arrive in  hall, wrote it down, and read it as if I was to take some exam.😊 I also asked some senior members about the sequence of meeting. And yes I decided the theme long back :"If You are Not You, Who are You".

Now the time has come when I have to go on stage and speak. Sach btau to yrrrr...."Fat rhi thi"

I started the meeting with the theme "If you are not you, then who are you". I explained the theme and asked members what are their view and experience. I decided this theme because it connects me with the core value of ACCEPTANCE.

There were 4 speakers and the topics selected by them were - Giving back, Earth hour, Developing a Mission and From CC to C(Copy Cat to ). Actually as MC I had to connect all the speeches with theme and it turned quite easy for me. Also I had to add my words after the speech and all topics turn out to be speak able for me. After prepared speaches, next session was Table topic or impromptu session and then we had a break for 10 minutes. In the break a new member came to me and told me that the theme is fantastic and I'm doing justice with the theme. This was a big boost for me. Also a guest approached me as he wants to join the club. I explained him the procedure and other things what I knew.

After break we again assembled and our last session- evaluation started. For evaluation I was suggested by my mentor two things: one is I should call the speech evaluator before the speakers comes on stage and if I can use Mic then I would be good.

This was how I did my first major role as MC. After the meeting I wss told that I did a good job. The feedback matter a lot for me. I can definitely say that every role be it anything - first it looks very tough or may be scary but mark my word after completing it what you feel is the biggest THERAPY.

And not to forget I again won the award for Best Role Taker i.e. MC😄.

Ravi Kant Sharma
9461257111
PWS

May 22, 2017

Condolences: Dr Akash Acharya

Dr Akash Acharya is no more with us, alas! He was suffering from depression for some time. We were in touch with him since 2006 or so. We were discussing various ideas on self help and stammering in those early years. He was a Professor at Centre for Social Studies (CSS), VNSG University Campus, Surat, Gujarat and had researched health care delivery models from societal perspective. 

In April 2008, Akash organised our first meeting in Mumbai (link), after which TISA as a community took off. Here are some press clips of that first meeting in Mumbai (link1, link 2). Akash also was very active in ISA (International Stammering Association) and represented our views in that forum. 

My memories of Akash will always consist, among others, of his lively participation in Goa national Conference in 2016: He came with his mother, Mrs Abha Ben, and both of them immersed themselves in the conference, participating with the young group whole-heartedly, sharing a word of encouragement here and a word of counsel there with a young troubled soul. May he rest in peace...

May 18, 2017

क्या आप सब कुछ छोड़ना चाहते हैं ?? ज़रा रुकें तो सही ...



" मैं  क्यों हकलाता हूँ  ?? सभी दोस्तों और भाई-बहनो में  मैं  ही क्यों हकलाता हूँ ?? ये विचार निरंतर मेरे मन में चल रहे हैं... हकलाहट के प्रति असंवेदीकरण की प्रक्रिया क्या है  ?? खुद की हकलाहट के प्रति  निरंतर चिंता को कैसे समाप्त की जाए ,..?? चाहे  कुछ पलों के लिए ही सही... 
        मैं  अपने इस त्री-वर्षीय अध्ययन-पाठ्यक्रम  से मुक्ति चाहता हूँ..... मैं   पढ़ नहीं पाया हूँ , जबकि अगले सप्ताह अर्ध-वार्षिक परीक्षाएं हैं .. मैंने अपनी हकलाहट को स्वीकार लिया है, पर मैं  उससे प्रेम नहीं करता ....  जीवन नर्क बन गयी है... मैं  सब कुछ छोड़ देना चाहता हूँ..... "

    ऐसे ईमेल मुझे युवा हकलाने वाले लोगों से ज्यादातर मिलते रहते  हैं ... इन्हें  पढ़कर मुझे ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई डूबता हुआ व्यक्ति सहायता  मांग रहा हो.....  ऐसी स्थिति में क्या किया जाए  ????

     पहली बात - आपको सोचने के लिए  मानसिक व् भौतिक  रूप से  एक खुले परिवेष  की आवश्यकता है....  आप ऐसा नहीं कर सकते, यदि आपने  अपनी  प्रतिष्ठित अध्ययन-पाठ्यक्रम  को छोड़ कर घर लौट जाने का मन बना लिया  है(या अपनी नौकरी छोड़ देने का मन बना लिया है)...-एक हार मान लिए  इंसान की भांति   .... क्योंकि ऐसी  निराशा में लिए निर्णय अपने दुष्परिणाम साथ लाते हैं ..... 

      आपकी मनःस्थिति  अन -अवरुद्ध  होनी चाहिए.... मेरी राय  है की आप 24 घंटे के लिए किसी शांत स्थान पर चले जाएं - किसी प्राकृतिक स्थान पर कैंपिंग , किसी आश्रम या आध्यात्मिक स्थान , या किसी ऐसे मित्र के पास जो  आपको अकेला छोड़ सके..... 
         अब कुछ समय के लिए प्राकृतिक-परिवेष  में टहलने चले जाएं , या किसी तालाब में तैराकी कर लें ...  इसके बाद एक कलम और कागज़ लें और अपने विचारों  को लिखें - अपने भय , चिंता , समस्याओं को लिखें। ....  सही - गलत शैली की चिंता न करते  हुए उन्मुक्त  धारा  में  लिखें...  जब तक हमारे अस्पष्ट विचार दिमाग में रहते हैं तब तक हमें घबराहट और चिंता होती है। .. कागज़ पर लिख देने से हम उन्हें  निष्पक्ष रूप से देख और समझ पाते हैं। ... 

     अब आप ये लिखें कि  आपके साथ अत्यंत भयावह परिस्थिति  क्या हो सकती  है ?? जब आप इसे लिखेंगे तो आप पाएंगे की इस परिस्थिति  से  जुड़े अन्य विचार भी आपके मन में आएंगे - इन्हें  भी लिखें। .. आप पाएंगे कि  घने अंधकार  में भी हल्की  सी प्रकाश की किरणें दिखेंगी । .. उम्मीद की इन किरणों से धीरे धीरे पूरी तस्वीर प्रकाशमय हो जाएगी। साथ ही आप पाएंगे कि  लिखने के दौरान ही इस भयावह परिस्थिति   के प्रति आपके मन  के   भय व्  दहशत कम  होते चले जाएंगे  । . आप पाएंगे की ये अत्यंत  भयावह  विकल्प  भी कई विकल्पों में से एक है - हम उसे  पूरे  यकीन से  अच्छा या ख़राब भी नहीं कह सकते हैं। .. 

     अब जब आपने सबसे अप्रिय संभावना  की परिकल्पना  कर ली  है, समझ ली  है - तो इससे वापस लौटें।  हकलाहट के कारण कोर्स छोड़कर चले जाने (या नौकरी छोड़ देने) से कम  नाटकीय विकल्प के विषय में सोचें।।। इंटरनेट पे तलाश करें कि  ऐसी परिस्थिति  में अन्य लोगों नें  क्या कदम उठाए । अपने ऐसे दोस्तों व् परिचित लोगों से फ़ोन पर बात करें जो आपको सलाह दे सकें। इन सभी श्रोतों से मिली जानकारी को अपने अन्तः-कर्ण  में ग्रहण करें।

      अब अपने विकल्पों को प्राथमिकता अनुसार क्रमबद्ध रूप में लिखें। ऐसी योजना बनायें जो अमल करने योग्य  हो। प्रत्येक गतिविधि के लिए उचित समय-सीमा एवं  पुनरावृत्ति  की  योजना लिखें।। साथ ही ये भी लिखें कि  प्रत्येक गतिविधि के लिए पहले से क्या-क्या तैयारी  करनी होगी। .. ध्यान रहे  कि ये बदलाव धीरे-धीरे हों व् इनके लिए उचित समय सीमा निर्धारित करें। .. बदलाव की गति ना बहुत त्रीव हो ना बहुत धीमी , मद्धम मार्ग अपनाएं। . भविष्य में इस योजना के विश्लेषण और आगे की योजना बनाने के लिए पहले से दिन निर्धारित कर लें। .. अब इस योजना की प्रतियां बना लें और उन्हें अपने घर के उन स्थानों पे लगा दें जहाँ आपका आना-जाना हो। ..

     चुंकि  अब आपकी योजना तैयार है , तो दिन के शेष वक़्त में कुछ मनोरंजक गतिविधि में भाग लें- कुछ नया,ऐसा जो आपके दिल को सुकून देने वाला हो (सिनेमा देखना इनमें शामिल नहीं है !!) ....  साइकिल चलाना   , तैराकी , नौकाटन  या कुछ और जो आपके दिल  को सुकून और  प्रेरणा देता हो। ...

      धयान रहे, ऊपर दिए गए सुझाव आपके कॉलेज कैंपस या कार्यस्थल की कोलाहल में  संभव नहीं हैं। . इनके लिए एकांत की आवश्यकता है। .. कुछ दिनों के अंतराल पर एकांत में जाना ही आजकल के " तनाव-पूर्ण जीवन-शैली " की दवा है। ..  दूसरी सीख ये है कि जब आप अत्यंत तनाव में हों , भाव-विभोर हों - तब किसी तरह का फैसला न लें। परवार-जनों,मित्रों और स्वयं के लिए आपकी इतनी जिम्मीदारी तो बनती है। ...

     अंत में , स्वीकार्यता का अर्थ है जीवन के सभी अनुभवों को स्वीकार करना - चाहे वो सुखद  , दुःखद  या निरपेक्ष हों। .. और इन अनुभवों को अपने लिए उपयोगी संभावनाओं  में परिवर्तित कर देना। .. जैसा कि  दक्षिण भारत की  एक गैर सरकारी संगठन करती  है - रद्दी इकट्ठा करके उसे रोज़ के इस्तेमाल के चीज़ों में परिवर्तित करना ,जिससे  हमारा वातावरण आने वाली पीढ़ियों  के लिए सुरक्षित रह सके ।  


नोट : क्या आप ये सोच रहे हैं कि आपको 24 घंटे की छुट्टी कौन देगा ? लेकिन कुछ देर पहले ही आप सब कुछ छोड़  देने की बात सोच रहे थे।  तो क्या आप केवल 24 घंटे का अवकाश नहीं ले सकते। . भगवान् ना करे ,  अगर आप बीमार हो जाते तो अवकाश लेते न ? असल बात है अपने परिवेष  से कुछ समय के लिए दूर जाकर विश्लेषण करना ।  इसके सिवा और कुछ भी कारग़र  नहीं होगा। .. शुभकामनायें। 

मूल अंग्रेजी लेख : डॉ सत्येंद्र श्रीवास्तव 
अनुवाद : अभिषेक कुमार 

May 8, 2017

April 28, 2017

Nature

Early in the morning as I made coffee in front of the kitchen window, I heard a bird call. The window opens on a narrow low gallery, beyond which there is a vast plot of trees and shrubs. Was it a bird, greeting spring, in April? I already had a brush with spring a few days back – with my eyes and nose streaming, sneezing as if there were no tomorrow etc. But then, it did not sound like a greeting. It was a plaintive call for help, more like a mewling of a starving cat. I said to myself: whatever it is, sachin, you cannot delay your morning walk. So, I put on my shoes and walked off in the tea gardens next to my home.

After morning walk, it was a hectic schedule of shower, quick breakfast, cleaning the car, getting ready for the office etc. All this, while my ears continued to pick up that faint mewling. I drove off to the office and returned nine hours later- and heard the same sound- but fainter now. I had seen enough of birth and death. I had euthanized four dogs personally. I had entrusted everything to Almighty now. I had no desire to get involved with one more life form. I thought it would be dead soon anyway.
But when I heard the mewling in the evening, I could not keep my curiosity in check, went out in the back lawn and carefully peered into the back gallery: There was a ball of fluff tumbling around at the farthest end, with slow and unsteady gait of a newborn. It was small- just like a little rat- weak, trembly, almost blind. Why did its mother leave it here? If crows saw it, they will finish it off- I thought with alarm and a deep ache.

I opened the other access door to this gallery and tried to give it some water in a bowl. It was not interested. It just stepped through the bowl and tumbled on. Then, I thought, let me give it a little milk. But even that did not work. I knew one woman who could rescue this premature abandoned kitten: Marian, my partner! She was sleeping upstairs. She came down. She picked it up- for the first time, I guess anyone had done so. It crawled up to her chest and began licking the lobe of her right ear. She held it as if it were a precious diamond ring or an egg. And I was looking with wonder at this immediate rapport across two species.

Finally, Marian said: It wont drink water or milk- they may even be harmful for it. I am sure her mother visits it and feeds it. Don’t worry. Cats are known to move their kitten 3-4 times, from place to place…

I wondered why did they do that? It seems that even well-meaning human attention to kittens is seen as an invasion by mom cat- and therefore she may move her kittens 3-4 times in search of privacy, in the first 6-8 weeks of their life. Since we could not do anything, we just left it there- in the safety of that gallery, with a silent prayer.  But I kept on thinking: has the mother died or what? I haven’t heard or seen her visiting this kitten. Do other cats ever adopt such foundlings? How would the kitten know, if mother is dead?

In the night, I did not hear any sound. Same in the morning. I thought, it must be dead by now. Should I check? I kept on dithering. Finally, I thought let me remove the dead kitten, if nothing else. But when I reached the gallery, it was still tumbling along in circles unsteadily. I could not believe it. How can it survive almost 72 hours with no care and food? I picked it up carefully and raced up to Marian, almost screaming: You must do something now or else, it will die. It has survived 72 hours… Let us give it a chance. I appealed. Marian needed no appealing.

She had grown up in a household which boasted of many pet animals- dogs, cats, birds, tadpoles and even a stork. The stork had injured its leg. Marian’s father rescued it, plastered (“desi style”) its leg and nursed it to full health.

She picked up the kitten, lifted it up to her chest, peered at its eyes and face- which had all the markings of a glorious cat. Then, with a surprise, she said: Feel its tummy. It is full… Its mother is visiting it and feeding it. Don’t worry. Let us put it back before mother comes looking for it…
I was very happy- and relieved. We put it back in the gallery, on a piece of rag.

Until the other day, I was hating the entire race of cats for being so careless… Nature has birth and death; But it also has nurture and caring. A cat must be scrounging around for food somewhere - to feed herself so that she can nurse her baby - I thought with wonder. Wow! Nature has thought through everything.  Humans just have to stop encroaching on other species’ habitat and be a little more thoughtful and considerate. 

A great problem had been resolved and I went back to Boccherini’s string quintet…

April 27, 2017

दिल्ली संचार कार्यशाला: एक कदम सपनों को हकीकत में बदलने की ओर . . .



देश की राजधानी नईदिल्ली में द इण्डियन स्टैमरिंग एसोसिएशन (तीसा) की 2 दिवसीय संचार कार्यशाला 22 एवं 23 अप्रैल 2017 को आयोजित की गई। होटल एसपीबी 87 पर हुई इस कार्यशाला में देशभर के 30 प्रतिभागियों ने भाग लिया। प्रतिभागियों में प्रमुख रूप से गरिमा, जगदीश मेवाड़ा, रामनिवास मीणा, ब्रजेश फौजदार, वरूण प्रताप सिंह, साहिल कुमार, गुरूविन्दर सिंह, मोनू ढींगरा, राजू, वृद्धि प्रतिम नियोगी, संजय नेगी, मनीष कुमार, अमित दाहिया, अंकित अवस्थी, मनीष अग्रवाल, राजेन्दर सिंह, रमेश, विजय बघेल, अमित निर्मोही, प्रमोद कुमार यादव, राजीव कुमार, लवमीत सिंह, जितेन्दर कुमार, दीक्षित अरोरा शामिल हैं। कार्यशाला की आयोजक टीम में रमणदीप सिंह, शैलेन्द्र विनायक, आशीष अग्रवाल, सिकंदर सिंह और रवि जग्गा रहे। अतिथि के रूप में अमित सिंह कुशवाह उपस्थित थे।
संचार कार्यशाला की शुरूआत करते हुए आशीष अग्रवाल ने कुछ नियमों के बारे में बताया। जैसे- खुलकर हकलाना, किसी दूसरे हकलाने वाले को बिना मांगे सलाह मत देना, अपनी बारी आने पर ही बोलना। आशीष ने प्रस्तावना रखते हुए तीसा की स्थापना के उद्देश्य एवं कार्यप्रणाली पर प्रकाश डाला। उन्होंने हकलाने वाले साथियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि यह कार्यशाला हकलाना ठीक करने या हकलाहट के क्योर का दावा नहीं करती बल्कि हम हकलाहट के प्रबंधन पर जोर देते हैं। आप सब हकलाते हुए भी एक कुशल संचारकर्ता बन सकते हैं। हकलाहट का कुशल प्रबंधन करना सीखने के लिए ही यह कार्यशाला आयोजित की गई है।
स्वीकार्यता एवं आइसबर्ग पर रवि जग्गा ने प्रकाश डाला। श्री जग्गा ने बताया कि हकलाहट को स्वीकार करने से हम अनावश्यक तनाव, डर और शर्म से बाहर आ सकते हैं। जब हम हकलाहट को स्वीकार करते हैं तो इसका मतलब यह है कि अब हम खुद को जैसे हैं, उसी तरह भीतर से स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना चाहते हैं। आइसबर्ग थ्योरी यानी पानी पर बहती हुई बर्फ की शिला या चट्टान का जिक्र करते हुए रवि जग्गा ने कहा कि हम हकलाहट के आन्तरिक पहलुओं के बारे जान ही नहीं पाते जबकि इन पर काम किया जाना जरूरी है। इस सत्र में स्वैच्छिक हकलाहट यानी खुद जानबूझकर हकलाने से सम्बंधित वीडियो दिखाए गए। इनमें दिखाया गया कि हकलाने वाला व्यक्ति खुद जानबूझकर हकलाकर, हकलाने के डर और शर्म से आजाद हो सकता है।
संचार कार्यशाला में विभिन्न गतिविधयों को व्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए प्रतिभागियों को 6 समूहों में विभाजित किया गया।
जलपान के बाद कार्यशाला के आयोजक रमणदीप सिंह ने प्रोलाॅगंशिएशन तकनीक के बारे में बातचीत की। उन्होंने बताया कि जब आप किसी स्पीच तकनीक का इस्तेमाल करेंगे तो सुनने वाले लोगों की प्रतिक्रिया नकारात्मक भी हो सकती है, इसलिए धैर्य के साथ ऐसी स्थितियों का सामना करना चाहिए। कई बार हकलाने वाला व्यक्ति स्पीच तकनीक का इस्तेमाल करने का संकल्प करना है, लेकिन कुछ ही देर बाद भूल जाता है, और फिर से हकलाने लगता है। उसका ध्यान अपनी बात कहने पर ज्यादा होता है। इसलिए बार-बार अभ्यास करते रहना जरूरी है।
शैलेन्द्र विनायक ने ध्यान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हम अपने दिमाग को शांत करने के लिए ध्यान करते हैं। 2 मिनट अगर हम शांत होकर बैठ जाएं तो हमारे अन्दर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
बाउंसिंग तकनीक के बारे में शैलेन्द्र विनायक ने चर्चा की। चर्चा के दौरान यह प्रश्न उठा कि कोई व्यक्ति बाउंसिंग तकनीक ही क्यों इस्तेमाल करे? प्रोलाॅगंसिएशन तकनीक में क्यों न बोले? इस पर सभी प्रतिभागियों ने अपनी राय दी। निष्कर्ष निकला कि प्रोगाॅसिएशन तकनीक में हम हकलाहट को थोड़ा छिपा रहे होते हैं, जबकि बाउंसिंग में हम खुलकर हकलाकर बोलने का अभ्यास करते हैं। इसलिए बाउंसिंग अधिक साहसिक और संतोषप्रद तकनीक है। इसके बाद सभी लोगों ने मंच पर आकर बाउंसिंग तकनीक में अपना परिचय दिया।
अगले सत्र में सभी लोगों को एक-एक कार्ड दिया गया। इस कार्ड में यातायात के संकेत बने हुए थे। सभी प्रतिभागियों ने स्पीच तकनीक का इस्तेमाल करते हुए दिए गए यातायात संकेतकों का वर्णन किया।
शैलेन्द्र विनायक ने थकान दूर करने के लिए एक शारीरिक गतिविधि करवाई। कूदो, नाचो, कूदो और बैठो, खड़े हो, बैठो। इस गतिविधि से लोग तरोताजा हो गए।
पाॅजिंग तकनीक पर गरिमा ने प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बोलते समय अपना मुंह अधिक से अधिक खोलकर बोलना चाहिए। पाॅजिंग सबसे आसान तकनीक है। इससे रूकावट कम हो जाती है, बोलने की गति सामान्य हो जाती है। वाणी में प्रवाह आ जाता है। सुनने वाला व्यक्ति हमारी बात सुनने के लिए आकर्षित होता है। हमें अर्धविराम पर 5-6 सेकंड तक और पूर्णविराम पर 10 सेकण्ड तक रूक चाहिए।
इसके बाद आॅई कान्टेक्ट (आंखों से सम्पर्क) पर आशीष अग्रवाल ने विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आॅई कान्टेक्ट हमारे संवाद का एक जरूरी अंग है। एक प्रभावी संचारकर्ता के लिए आॅई कान्टेक्ट बहुत उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है।
इसके बाद गरिमा ने बाॅडी लैग्वेज (शारीरिक भाषा) पर प्रतिभागियों से चर्चा की। गरिमा ने कहा कि शारीरिक भाषा हमारे आत्मविश्वास को प्रदर्शित करती है। दूसरे लोग प्रभावपूर्ण तरीके से हमारे संचार पर ध्यान देते हैं। इसके लिए चेहरे, कंधे और हाथ-पैर के साथ ही हाव-भाव पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। बात करते समय थोड़ा मुस्कुराना चाहिए। अपने मन को हमेशा शांत रखें, प्रणायाम करें और स्वास्थ्य पर भी ध्यान दें। इन सबका हमारे संचार पर सीधा असर पड़ता है। खुद को प्रेरित करें और हमेशा सकारात्मक रहें।
गरिमा ने आगे बताया कि आपको हकलाते हुए भी अच्छा हाव-भाव बनाए रखना चाहिए। अपने शरीर को मुक्त करके रखना चाहिए, जकड़कर नहीं। साथ ही हाव-भाव को विषय के अनुसार प्रदर्शित करना चाहिए। एक ही जगह खड़े न रहकर चलते हुए बोलना, सुनने वालों की तरफ आॅई कान्टेक्ट रखना चाहिए। हमारी 70 से 90 प्रतिशत तक हकलाहट शारीरिक भाषा पर काम करने से ठीक हो सकती है।
कार्यक्रम में विशेष अतिथि अमित सिंह कुशवाह ने कहा कि स्वीकार्यता में जीवन की समग्रता समाहित है। स्वीकार्यता का मतलब है जीवन में अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाना। आज हर व्यक्ति कभी न कभी हकलाता है, धाराप्रवाह बोलना हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं। हकलना भी बोलने का एक तरीका है।
दोपहर के भोजन के बाद सवाल-जबाव का सिलसिला शुरू हुआ। इसमें एक प्रतिभागी सामने मंच पर आया और बीच में बैठे हुए एक प्रतिभागी ने कोई भी सवाल पूछा। जब 20 साल के संजय नेगी मंच पर आए तो उनसे एक सवाल पूछा गया- हकलाहट के हानि या लाभ क्या हैं? संजय ने उत्तर दिया- फोन की जगह एसएमएस या व्हाट्सएप कर देना, सामाजिक मेल-मिलाप कम हुआ है हकलाहट के कारण। हकलाने का लाभ यह है कि मैंने बहुत कुछ जानने का प्रयास किया है।
गरिमा ने वृद्धि प्रतिम नियोगी से पूछा- आपने हकलाहट से क्या सीखा?
श्री नियोगी ने कहा- हकलाने के कारण मेरा मनोबल मजबूत हुआ है। पहले मैं एकदम चुप रहता था, आज मैं एक पूर्ण व्यक्ति बनने की ओर अग्रसर हूं।
अगले सत्र में कुछ प्रेरणाप्रद वीडियो दिखाए गए। इनसे यह सीख मिली की हकलाहट हमारे जीवन में कभी भी बाधा नहीं बन सकती। हकलाने वाले व्यक्ति हर क्षेत्र कार्य कर सकते हैं।
फिर एक गतिविधि हुई। सभी ने अपनी नोटबुक पर धन्यवाद सूची बनाई। हमारे जीवन में कई लोगों ने हमारी मदद की, हमें आगे बढ़ाया, उन सबके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करना था। प्रतिभागियों की सूची में किसी ने 10 तो किसी ने 22 बिन्दु शामिल किए। सबसे लम्बी धन्यवाद सूची बनाने वाले प्रतिभागी को सम्मानित किया गया।रमणदीप सिंह ने लक्ष्य निर्धारण पर अपना प्रस्तुतिकरण दिया। उन्होंने बताया कि हमें हकलाहट का कुशल प्रबंधन करने के लिए छोटे-छोटे लक्ष्य बनाकर निरंतर अभ्यास करना होगा, तब हम एक कुशल संचारकर्ता बन पाएंगे।
पहले दिन का समापन एक रोचक गतिविधि से हुआ। सभी प्रतिभागियों को एक-एक पर्ची दी गई। उस पर्ची में आसपास के किसी व्यवसायिक प्रतिष्ठान या दुकान का नाम व पता लिखा था। प्रत्येक व्यक्ति को पूछताछ करते हुए जाना था और किसी स्पीच तकनीक या खुलकर हकलाकर बोलना था और उस स्थान पर जाकर एक सेल्फी लेकर वापस पास के शास्त्री पार्क पर आना था। इस प्रकार सभी अपनी पर्ची पर दिए गए पते की खोज करने के लिए निकल पड़े। लगभग एक घण्टे बाद प्रतिभागी शास्त्री पार्क पहुंचे और वहां पर अपने अनुभव साझा किए। एक अनजान शहर में अनजान लोगों से पता पूछना, सभी के लिए रोचक अनुभव रहा।
दूसरे दिन की शुरूआत में तीसा के कुछ रोचक वीडियो दिखाए गए जिसमें स्वीकार्यता और स्पीच तकनीक के बारे में सभी को जानकारी मिली। इसके बाद पहले दिन की गतिविधियों को दोहराया गया। फिर सबने जलपान किया।
जगदीश मेवाड़ा ने एक सुंदर बात कही- जब हम दूसरे किसी काम को करने में जोर नहीं लगाते जैसे- पेन उठाना, पैर उठाना, हाथ उठाना, उसी तरह हमें बोलने में भी जोर नहीं लगना चाहिए, प्यार से हकलाना चाहिए।
संजय नेगी ने कहा- मैं खुद की हकलाहट को स्वीकार करता हूं, लेकिन खराब संचार को नहीं स्वीकार करता। इसलिए हमें एक कुशल संचारकर्ता बनने के लिए मेहनत करना चाहिए। मेरा मानना है कि बहुत अच्छी सोच रखने से बेहतर है थोड़ा सा कोई अच्छा काम करना। यह कार्यशाला इसलिए सफल है क्योंकि यह हकलाहट को क्योर करने का झूठा दावा नहीं करती। यह मंच हमें सच का सामना करने की प्रेरणा देता है।
रमेश ने कहा- हकलाहट के कारण मुझे नई चीजें सीखने का मौका मिला। मैंने कई धर्मग्रंथ पढ़े और उन पर चिन्तन-मनन किया। इससे मेरे जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है।
इसके बाद प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए।
फिर एक चुनौतीपूर्ण गतिविधि आयोजित की गई। इसमें एक प्रतिभागी ने मंच पर आकर किसी भी विषय पर बोला और बाकी सब सुनने वाले प्रतिभागियों ने उसकी वाणी, हकलाहट, हाव-भाव, विषय वस्तु का मजाक बनाया। इससे वक्ता को धैर्य के साथ बोलने और अपमानजनक परिस्थितियों में साहस बनाए रखने की प्रेरणा मिली।
अगले सत्र में शैलेन्द्र विनायक ने नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) के बारे में चर्चा की। उन्होंने बताया कि ध्यान का पहला सूत्र है शरीर की शु़िद्ध। खुद को स्वस्थ्य बनाए रखने के लिए ध्यान बहुत लाभकारी है।
एक और बाहरी रोचक गतिविधि की गई। इस गतिविधि में सभी 6 समूहों को आसपास के होटल में जाकर एक काल्पनिक कार्यक्रम आयोजित करने के सम्बंध में बातीचत करनी थी और इवेन्ट का कोटेशन लेना था। इस गतिविधि में किसी समूह ने 5 से किसी समूह ने 15 होटल के कोटेशन प्राप्त किए।दोपहर के बाद सभी लोगों ने पिछली गतिविधि पर अपने अनुभव साझा किए। एक प्रतिभागी ने कहा- होटल के स्वागत काउन्टर पर बैठे कर्मचारियों में बड़ा धैर्य होता है, वे हमारी बात को ध्यान से सुनते हैं। विजय बघेल ने बताया- हमारा समूह 5 होटल में गया। वापस आते समय एक शेरवानी का बड़ा शोरूम था। पहले हमें डर लगा कि इतने बड़े शोरूम में जाने पर कहीं कोई गड़बड़ न हो जाए। आखिरकार हम लोगों ने सोचा जो होगा देखेंगे। हम 5 साथी शोरूम में चले गए। मेरे साथियों ने पहले ही योजना बना ली थी, मुझे दुल्हा बनाने की। साथियों ने कहा- ये हमारे दोस्त हैं, इनकी शादी है, शेरवानी दिखाईए। यह एक बहुत आलीशान शोरूम था। हम पहले तल पर गए। वहां पर शोरूम के कर्मचारी ने कई महंगी शेरवानी दिखाई। अंत में एक शेरवानी मैंने पहनकर देखा। दूल्हे की तरह मुझे उस कर्मचारी ने सजाया। फिर बोला- यह पूरा सेट 28,000 का पड़ेगा। हम लोगों कहा- ठीक है। हम लोग कल आएंगे, आॅर्डर देने। इस प्रकार यह बहुत साहसिक अनुभव रहा।
फोन पर बातचीत करने के अनुभव को जानने के लिए एक गतिविधि की गई। इसमें सभी प्रतिभागियों ने मंच पर आकर किसी अनजान व्यक्ति से बातचीत अपने किसी कठिन शब्द के साथ। अधिकतर लोगों ने दिल्ली मेट्रो के स्टेशन पर फोन कर ट्रेन की जानकारी ली, तो किसी ने बीमा एजेन्ट बनकर अनजान नम्बर पर फोन किया। इससे सभी ने सीखा कि फोन पर बातचीत कैसे करनी है और सुनने वाला व्यक्ति अपना धैर्य खोता है या नहीं, यह जानना अच्छा अनुभव था।
तीसा के वरिष्ठ सदस्य एवं सहयोगी सिंकदर सिंह ने ध्यान पर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि हम सोचना बंद नहीं कर सकते। हम दिन-रात सोचते रहते हैं। हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही हम महसूस करते हैं। ध्यान हमें सिखाता है कि हमेशा सकारात्मक सोचो, अच्छा सोचो, बेहतर करो।
दिल्ली के ही जितेन्दर गुप्ता ने बताया कि तीसा से जुड़ने बाद उनके अन्दर कई गुणों का विकास हुआ। जैसे- बैठक आयोजित करना, फोन पर बातचीत करना और जिम्मेदारी उठाना। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद एक बिजली कम्पनी में नौकरी लग गई। मेरा काम था बिजली चोरी को पकड़ना और उस पर कार्यवाही करना। यह हकलाने वाले व्यक्ति के लिए एक कठिन कार्य है। लेकिन मैंने यह बहुत ही साहस के साथ किया और कम्पनी के अधिकारियों के विश्वास पर खरा उतरा।
आखिरी में नाटक मंचन की गतिविधि आयोजित की गई। इसमें 4 ग्रुप में 4 नाटक मंच पर खोले गए। सभी नाटकों में हकलाहट को जरूर शामिल किया गया। नाटकों में इण्डियन आॅईडल का आडीशन, बस में महिला-पुरूष के बीच नोकझोंक, हवाई यात्रा के दौरान एक यात्री का हंगामा और स्कूल में क्लास रूम, टीचर और बच्चों के बीच संवाद। ये सभी नाटक बहुत ही रोचकता के साथ खेले गए।
अंत में प्रतिभागियों ने संक्षिप्त में बताया कि इस कार्यशाला में आकर हकलाहट के बारे में उनका व्यावहारिक ज्ञान बढा है और वे यहां से जाने के बाद हकलाहट के प्रबंधन पर कारगर तरीके से कार्य करेंगे।
सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद और ढेरों शुभकामनाएं।
फिर मिलेंगे…


AMITSINGH KUSHWAHA

April 25, 2017

Being Cactus


Yes it’s a weird title for an article. B-e-i-n-g C-a-c-t-u-s. It’s very difficult to express how I am feeling. Few will find it funny, few will find it surprising, many will be shocked, and yes, some will be like “Why Atul… Why???” But yes, it is like that, I feel like a cactus. Now you’ll say why Cactus?
Yes a Cactus. “Ohhh it’s so scary”, “It has prickles”, “It can hurt”, “and It’s bad”. Bad, well not really. Just so you know, it has prickles to safeguard itself from others. From those merciless animals out there. It’s scary but who made it that way? Or why is it that way? A memory revisit to 9th standard Biology class will tell you it has to be fleshy to retain water, retain water in desert. To retain the spark of life in death full of darkness. It was its fate to be fleshy, to be spooky and to be dangerous. But there is nothing it can do for this. A Cacti is born to give pain in order to live. Hope there could have been some technology to get to know how a cactus feels. I am sure it must be feeling like me. You know what is worst? That feeling when you know you have to hurt your loved ones knowing that’s the last thing you wanna do but you have to do In order to make them un-love you cause they love you much but you know you are not entitled for that. Ya, I know it’s too complex well life also is. Isn’t it?
A Cacti is forever alone but should it be? For many it’s just a decorative material. It is kept to boost the morale of the fashionista inside you. Cactus is meant to make a style statement. Look around, there are many types of Cactuses. Some are short, some are long, some are cylindrical and some are spherical. But howsoever they are, these all are entitled for just one treatment- Keep Safe distance. Distance from friends, distance from neighbors distance from loved ones. And if you’ll not follow this rule, if you’ll try to come closer to a Cacti, you will get pricked by it. You will end up hurting yourself. A Cactus is meant for corner place in your drawing room and it is certainly not meant for your bedroom. The best part is, Cactus knows this. The Cactus knows its fate and that’s why people try to show their care for that. Just to give the Cacti a false hope. When the truth is a Cacti is likeable but not lovable.
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I remember those childhood days when I with my father and brother were used to go to test our Sniper Skills with an Air-Gun to a jungle full of trees and yes some Cactus. I remember once I thought just for change lets shoot those Cactuses. Pulled the gun, aimed and “Dhishkiyaoo’n”, nothing happened. Now I focused like Arjun in Mahabharata, again Aimed, pulled the trigger, pellet fired but nothing happened to the Cacti. I repeated this 7 to 8 times, every time the same result. The Cacti didn’t moved by a millimeter. By this bro was Laughing & teasing me that I’m such a bad in shooting. I was so furious that I threw away the Air-Gun and went near the Cacti thumping my feet on ground in frustration.  It was then when I noticed there were total 8 holes in the Cacti
Actually, Cactus also has one more peculiar property that there flesh is pretty soft, so much so that it acts like a shock absorber. We standing several feet away didn't noticed that these pellets actually went through that cactus. That means you can’t know what a Cactus is going through from a distance. To know the real pain of the Cactus you need to come really close to it, which the Cactus never wants you to do cause you’ll get hurt in the process. So whenever and wherever you see a Cacti take care of it. And yes it’s not that bad being a Cactus as it sounds. Though It's quite complex, but yes that's how I'm feeling now.

April 16, 2017

ToastMaster - The New Journey

Hello friends
I was thinking of joining of TM for a very long time but joined it recently. Sharing with you my CC 2 speech for which I won the Best Speaker Award too competing with people delivering their CC 10 and ALB....

Ravi Kant Sharma
PWS
9461257111


संगीत ही मेरी असली पहचान हैं

दोस्तों जैसा की मैंने अपनी पिछली पोस्ट में बताया था की ट्रेनिंग में हमने बहुत से एक्टिविटीज की, उन्हीं में से संगीत भी एक था।  आपके साथ अपने वीडियो साझा कर रहा हूँ। और हां इसके लिए मुझे अवार्ड भी मिला।  हाहाहाहा...

हमने एक नाटक भी किया था लेकिन उसका वीडियो मेरे पास अभी नहीं हैं।  जैसे ही वीडियो आता हैं मैं आपके साथ साझा करता हूँ।

सादर
रवि कांत शर्मा
(हकलाने वाला व्यक्ति)
9461257111




खुद को मुक्त कर देना

दोस्तों काफी समय से मैं ब्लॉग पर नहीं लिख पाया, समय काफी था पर मेरा प्रबधन शायद सही नहीं था। इसलिए वीडियो के माध्यम से घटनाओ को साझा कर रहा हु।

सादर
रवि कांत शर्मा
(हकलाने वाला व्यक्ति)
9461257111





April 15, 2017

Socialisation into gender

I came across this wonderful video about socialisation into gender..

https://www.youtube.com/watch?v=BX40VRSKN4Q

धिस इस माय स्टाईल..


मेरी बेटी स्वरा भी हकलाती है. बचपनसे. ओव्हर्ट है. मैने मेरी तरफ से उसे मै समजाता हू. बहुत बाते करता हू उससे.
उसका सून के लेता हू. बडे प्यार से. कभी कभी एक वाक्य बोलने के लिये वो पांच मिनिटं से ज्यादा समय लेती है.
फ़िर भी मै उतनी ही सहजता से उसे सूनता हू. उसे समजाता हू. अपने तरिके से.
समजती है वो..
कभी रोती है
पर बोलना नही छोडती वो
कभी तुटती है कभी बिखरती है..
महज दस साल कीं है वो
मै उसको समजाता हूं.
अपना बोलनेका एक अलग स्टाइल है
ऐसेंही हम बोलते है
बिनदास्त रहनेका
खुल के बोलने का..
ये सूनके मुस्कुरा देती है वो..
उसका नाम स्वरा है..
उस दिन मुझसे पुछ बैठी वो..
क्या मतलब है स्वरा का?
मैं बोला..
स्वरा याने मिठी आवाज..
जो सून के मन में थंडक आवे
जो आवाज मन को भावे
जिसे सूनने को सबका दिल चाहे..
ये सूनकर हस पडी
और मै न चाहते हुवे मन में रो दिया..
आज स्कूल से आई और लंपट मुझसे गयी..
मैने कुछ ना पुछा उसे..
कुछ अंतराल के बाद खुद बोली मुझसे..
” पता है पापा आज स्कूल में क्या हुवा?
मैने कुछ ना पुछा..
फिर बोली..
मेरे फ्रेंड मुझे हरदम बो बो बो बोलते थे कि स्व स्व स्व… स्वरा तू ऐसें क्यो बात करती है?
व्हा व्हा व्हाय यू स्प स्प स्पिक लाईक दॅट?
मेरे पास कुछ जवाब न था पापा…
मैं सहमाकर खुदको कोस रहा था..
मेरा बचंपन फ्लॅश बॅक की तरह सामने आ रहा था..
मन में एक ही खयाल..
अब आगे क्या? कही मेरा अतिथ तो नही सामने आयेगा मेरे?
मेरा अतिथ हंस रहा था मुझपे…
मैं उसकी नजरे टाल रहा था..
स्वरा मुझे देख रही थी..
कूछ तो सोच रही थी…
मैने धीरज समेंटकर उसे देखा…
उसकी आखो में अजीब सा नझारा देख रहा था मैं..
मेरा हाथ हाथोमे पकडे मेरी स्वरा मुझसे बोली..
.
पापा आ आ रिसेस में आजभी फ्रेंड्स ने पुछा तू तू तू ऐसें क्यो बोलती है?
मैने कहा..
धिस इस माय स्टाईल.. इफ यू यू वॉन्ट टू लर्न इट देन आई आई आई विल टिच यू ऑल…
स्वरा की आखे अब चमक रही थी..
ऐसी आखे ना मैने आजतक देखी ना सुनी..
वो बोली…
उसके बाद किसिने मुझे पुछा नही की स्व स्व स्व स्वरा तू ऐसें क्यो बोलती है?
आज बेटी ने कभी ना भुलने वाला पाठ पढाया.
सही मायनो में मुझे सिखा गयी मेरी 10 साल की टीचर..
काश मैं जब उसकी उमर का था तब ये सिख पाता? जिंदगी कुछ और होती हम भी कुछ और होते…
अपने व्यंग को कभी धुत्काराना नही उसे समजाना और उसे अपनी ताकत बनाना.
मैं देखता रह गया और वो मुझे सिखाके बॅडमिंटन खेलने चली गयी..
संतोष
TISA Mumbai SHG

April 13, 2017

This is my style...


My daughter Swara stammers since her early childhood,just like me.. Her stammering is overt. I try to make her understand… I talk to her so much..I listen to  her talks too, with much love.. At times she takes more than five minutes to complete a sentence. Still I listen to her with patience.. I try to make her understand in my own way..She understands..sometimes she cries..but she does not stop speaking.. At times she becomes  disheartened..
She is just 10 year old..
I try to make her understand that our speaking style is different…
We speak in this way only..
We need to be carefree..
We have to speak freely..
She smiles when she  listens to my such  talks..
Her name is Swara.. The other day she asked me the meaning of Swara..
I replied that Swara means sweet voice, which soothes the mind.. which everybody loves to listen to.. She smiled listening to my explanation,  and though unwillingly, I cried within…
Today she returned from school and hugged me.. I remained silent.. After sometime she spoke-“Papa, do you know what happened today at school?”..I was silent…She continued.”My friends always ask me  that Sw.sw.swara why do you sp.sp..speak this way.. I had no answer to this question Papa..”
I was cursing myself.. My childhood flashed  in front of me.. My only thought was-what next.. would my past haunt me again? My past was mockingly staring at me.. I was averting its gaze..
Swara was watching me, some thoughts passing through her mind ..
I reclaimed my composure and looked at her..a strange expression gleamed in her eyes..
Holding my hands in hers, she said” Papa, today again my friends taunted me that w..why do I ssspeak this way.. I replied that this is my style.. If you wish to learn it then I can teach you all..”
Swara’s eyes were gleaming now.. I have never seen or heard of such eyes …She continued..”After that, no one asked me that ww..why do I speak th..this way.”
Today, my daughter taught me the lesson of a lifetime..
My ten year old daughter taught me in true sense.. What if I had learnt this lesson when I was her age..Life would have been different!! I would have been a different person.. Never abhor the taunt of others, understand it and make it your strength..
I kept looking, as my daughter hopped away to play badminton..

Originally posted in Hindi by Santosh(Mumbai SHG), translated by Abhishek..

April 9, 2017

New Insights

Here is a true story of a girl who stammered, but ho came out of her problems using a SOCIAL route. Seeing stammering, not as a disease but a social issue is view which works and which is increasingly becoming popular.. Check it out:

http://www.voice-online.co.uk/article/young-woman-overcomes-stammer-and-goes-mentor-others 

Ajmer SHG: First SHG Report

Ajmer 1st Shg meeting report:
Members
1:Pawan
2:Murlidhr
3:Gaurav

Meeting started 10:00
Location :  Anasagar lake , Ajmer

Starting with introduction then yoga and meditation.
Speech on general topics like politics by Murlidhr , Ajmer tourism by Pawan and Indian history by me (Gaurav).. then story making by loud speaking in public, this activity was very interesting one because we had choosen a public place so kids and public got gathered and all were listening story with great interest and enjoying with there local food by vender..
Then we had photo session at beautiful location of Anasagar lake.
Finally we dealt with public , telling and asking them about stammering, very interesting it was .. people listened with great interest and replied us. They all took it positively.. we talked with 9-10 peoples there..

For joining SHG meetings in Ajmer, contact:
Gaurav : 09887245139
Pawan : 08104053393
Murlidhar : 09001868105