March 2, 2014

Book Review - Amazing secret of Psychic Healing

कुछ दिनों पहले ही मैने विदेशी लेखक की पुस्तक (Amazing secret of Psychic Healing by Benjamin O. Bibb )  पढी है, मेरे अंग्रेजी जानने वाले दोस्त पुस्तक  (link) download  कर पढ  सकते हैं ये समीक्षा हिंदी जानने वालों के लिये है -


पुस्तक मे शारीरिक और मनसिक समस्याओं , रोगों के कारण और निवारण के बारे मे बहुत ही सूक्ष्म विवेचना की गयी है इस पुस्तक को पढकर मेरे कई सारे सवालों के जवाब मिल गये , जो शायद हर PWS के मन मे घुमडते रहते हैं   मैं इस पुस्तक की समीक्षा हकलाहट के परिप्रेक्ष्य मे करने की कोशिश कर रहा हूं शायद आप लोगो के मन भी ये सवाल उठते होंगे-
क्या stammering  का कारण वास्तव मे डर, किसी की नकल, पापा मम्मी या शिक्षक की डाँट ही है, क्या वाणीविकार का कारण वास्तव मे शारीरिक कमजोरी या गलत श्वसन प्रक्रिया है या कुछ न्युरोन्स मे Block इस वाणीविकार का कारण है ?? पर क्या वास्तव मे यही कारण है ??  कई लोगों ने हम से भी ज्यादा किसी हकलाने वाले की नकल की होगी वो PWS नही |हम सबने ऐसे कई लोग देखे होंगे जो बहुत ज्यादा डरते हैं , पर वो नही हकलाते हमारे ही भाई-बहन या सहपाठियों ने शायद हम से भी ज्यादा डाँट फ़टकार या मार खायी हो , पर वो नही हकलाते कई लोग शारीरिक रूप से हम से भी ज्यादा कमजोर होते हैं पर वो नहीं हकलाते ,



कई लोगों को बचपन से लेकर बुढापे तक जुकाम से ग्रस्त देखा होगा (जुकाम से श्वसन प्रक्रिया असंतुलित हो जाती है) पर वो धाराप्रवाह बोलते हैं रही बात न्युरोन्स के block होने की, तो वो हकलाने वाले के ही क्यो अवरुद्ध हुए, कब अवरुद्ध हुए , जनम से पहले या बाद मे और जब केंसर , बडे बडे ट्युमर ठीक हो सकते हैं, जब वैज्ञानिक कहते है कि हर रोज करोडों कोशिकाएं नयी तैयार होती है , कुछ महिनों  मे हमारे शरीर का हर अंग, कुछ साल मे complete शरीर नया बन जाता है, जब परिवर्तन प्रकृति का नियम है तो ये न्युरोन्स के  Block कैसे शाश्वत हो गये ? जब भीषण दुर्घटनाओं मे बने बडे बडे घावों को ठीक करने का Program हमारे अवचेतन मे मोजूद है , जब बडे बडे अस्थियों के फ़्रेक्चर को जोडने का Program  हमारे अवचेतन मे मोजुद है तो धागे से भी महीन न्युरोन्स के Blockage खोलने का Program नहीं होगा ??

मेरे मन के ऐसे सवालों के जवाब मिला इस पुस्तक से |
According to this book, हर आदमी की चेतना मे (अवचेतन मस्तिष्क  मे) एक पूरा प्रोग्राम उस समय से ही निश्चित रहता है जब वह माँ के गर्भ मे केवल एक कोशिका के रूप मे होता है , उस एक कोशिका से कैसे करोडो अरबों कोशिकाएं बनेगी , हाथ पैर ऑखे कैसे होगी ये प्रोग्राम उसकी चेतना मे पहले से ही मोजूद रहता है अगर हकलाहट को ले तो ये प्रोग्राम भी हमारी चेतना मे पहले ही निश्चित था , अब उसने वैसे न्युरोन बनाये या वो Program किसी के गलती से RUN / CLICK करते ही  ACTIVATE हो गया चाहे वो पापा मुम्मी या टीचर की डाँट हो नकल करना हो दूसरे सामान्य शब्दों मे कहें तो वो ईंधन पहले से ही हमारी चेतना में था जो बाहर की छोटी सी चिंगारी से भभक उठा और हम सारी जिंदगी दोष चिंगारी को देते रहे अपने अंदर का ईंधन  खाली करने के बजाय ईंधन भरना अभी भी बंद नही किया , Accept नहीं किया

समाधान :
किसी महान आदमी ने कहा है - अगर कोई समस्या बनायी जाती है  तो समाधान उसका पहले खोज लिया गया है, भगवान इतना निर्दयी या मूर्ख नही है कि समस्या बनाकर निरीह प्राणियों के लिये छोड दी हो जैसे पार्क मे भूल-भुलैया ही नही बनाया जाता, बाहर निकलने का रास्ता भी बनाया जाता है   तो समाधान यह है कि हमे हमारी चेतना को दुबारा से Command देना होगा अवचेतन मन (Sub-conscious mind) को लगातार सकारात्मक विचार सकारात्मक भावनायें भरनी होगी , पर अवचेतन मन शब्दों की भाषा, लिपि को नही समझता, अवचेतन मन समझता है चल-चित्रों MOVING PICTURES को, VISUALIZATION को , अतः हमे लगातार रोजाना अपने मन मे स्पष्ट , प्रभावी , धाराप्रवाह वक्ता , good communicator होने की गहन भावनायें भरनी होगी , जब तक की अवचेतन मन हकलाहट को भूल ना जाये , पूरी एकाग्रता के साथ चलचित्र की भांति कल्पना करनी होगी अच्छा संभाषणकर्ता  करने की , हमें उसको महसूस करना होगा   अब तक हम जो कुछ कर रहे है चेतन मस्तिष्क (conscious mind) के स्तर पर ही कर रहे हैं और वो भी पूरी एकाग्रता के साथ नही कर रहे पर समस्या अवचेतन मस्तिष्क की है , चेतन मस्तिष्क तो सारे दिन प्रयास करता है ठीक बोलने की, पर अचानक सब कुछ अनियंत्रित हो जाता है, अतः चेतन मस्तिष्क को पहले शांत करना होगा फ़िर अवचेतन मस्तिष्क मे गहन सकारात्मक भावनाय़े भरनी होगी और जैसे जैसे वो गहन भावनायें मस्तिष्क की गहराईयों तक जाती जायेगीसोच जैसे जैसे बदलती जायेगीन्युरोन्स के ब्लोक स्वतः ही खुलते जायेंगे जैसे घाव , फ़्रेक्चर ठीक  हो जाते हैं , doctor prescribes medicine , just to curb infaction or reduce pain.  So every PWS must do Positive affirmation in moving pictures.
         पर ये सब होगा acceptance की बुनियाद पर जितना लंबा हमारा हर हकलाहट पर , हर Block पर मातम होगा उतना ही ज्यादा  हम डर , शरम, घृणा, आत्मग्लानि से अपने मन-मस्तिष्क को भरते रहेंगे, अपनी चेतना मे और ज्यादा समस्या बढाते जायेंगे so Better to Focus on Solution, but without acceptance , we focus on problem.
जो बात विदेशी लेखक अब बता रहे हैं, स्वामी विवेकानंद ने 100 साल पहले कह दी थी -

एक विचार लो  . उस  विचार  को   जीवन  बना  लो - उसके  बारे  में  सोचो  उसके  सपने  देखो , उस  विचार  को  जियो  . अपने  मस्तिष्क , मांसपेशियों , नसों , शरीर  के  हर  हिस्से  को  उस विचार में  डूब  जाने  दो , और  बाकी  सभी विचार  को  किनारे  रख  दो . यही सफल  होने  का तरीका  है.”

6 comments:

sachin said...

बहुत सही और सामायिक...
हम हिंदी भाषियों के लिए आपका प्रयास सराहनीय है..
अवचेतन मन से निपटना इतना मुश्किल. नहीं है बशर्ते हम चेतन मन से सफलता पूर्वक निपट चुके हों
ये ज्यादा बड़ी चुनौती है हम में से बहुतों के लिए..
निश्चित रूप से विशुअलाइजेशोन एक उपयोगी तकनीक है इस दिशा में..
इसी तरह लिखते रहे और अपने विचार बाँटते रहें..

Anand said...

हेमत जी ,

आपने जो लेख लिखा वो बहत ही ज्ञान वर्धक और सराहनीय है, अब मेरा भी हाकलाहट के बारे में सोचने का नजरिया बदला है.

इस महत्वपूर्ण लेखन के लिए बहुत - बहुत धन्यबाद!


आनंद सिंह

Amitsingh Kushwah said...

हेमन्त जी, बहुत धन्यवाद। हिन्दी में लेखन और एक बहुत ही महत्वपूर्ण, रोचक और सामयिक पुस्तक की हिन्दी में समीक्षा करने के लिए। इससे हिन्दीभाषी हकलाने वाले साथियों को बहुत लाभ होगा। साधुवाद और आभार।

Vijay Kumar said...

great Hemant jee.

Hemant Kumar 靈氣 said...

हिन्दी मे लिखने पर उत्साहवर्धन के.लिये धन्यवाद.

असल मे देखा जाये.तो हर PWS अनजाने.मे.अपने अवचेतन मस्तिष्क को लगातार एक command देता रहता है कि "मुझे हकलाना है " . वो सोचता तो.है कि हकलाना नही है पर नही शब्द के साथ ना कोई भावना है ना कोई moving picture .सो "नही" शब्द delete हो जाता है और final message जाता है "हकलाना है" so poverty है तो prosperity के बारे मे सोचना होगा

Hansraj Jangid said...

Overall good research