June 7, 2013

Treking v/s Stammering and some observations

 मैं और group Leader
दोस्तों ,  यदि आप हकलाते हैं तो ये सोच लेकर ना जिये कि एक दिन चमत्कार होगा और मैं धाराप्रवाह fluent वक्ता बन जाउंगा और फ़िर मैं अपने शौक पूरे करुंगा । अपने शौक आप आज और अभी से पूरे करना शुरू कर सकते हैं, इससे आत्मविश्वास भी बढेगा और हकलाहट भी कम होती जायेगी ।

 मैं 11 से 22 मई पर्वतारोहण अभियान Trekking Expedition पर  था ।  मैं इसकी कुछ मुख्य बातें साझा करना चाहता हूँ  ।

संगम चट्टी से य़मुनोत्री trek-

संगम चट्टी से 20 किमी का Trek पूरा कर हम डोढीताल पहुँचे ।
"डोढीताल "- वह तालाब जहाँ माता पार्वती स्नान करती थी



"डोढीताल "- वह तालाब जहाँ माता पार्वती स्नान करती थी, अपने मैल से गणेश जी बनाये, शिव जी ने गणेश जी का सिर काटा और हाथी का सिर लाकर जोडा था । 
 डोढीताल मे गणेश - पार्वती मंदिर

 










  वहाँ एक बाबा रहते हैं , बाबा ने बताया - तुम लोग जल्दी आ गये अभी मई की शुरुआत है , पहाडों पर बर्फ़ जमी हुई है , 2 दिन पहले ही एक अंग्रेज उस रास्ते को पार करते वक्त स्वर्ग सिधार चुका है ।




हमारा गाईड आगे बढने को तैयार नहीं था क्योकि वो एक अप्रक्षिशित स्थानीय गाईड  था जिसके पास ice stick भी नही थी जिससे पता चल सके कि बर्फ़ कच्ची है या पक्की । खतरे कई थे जैसे बर्फ़ कच्ची हुई नीचे पानी हुआ तो कच्ची बर्फ़ पर पैर पडते ही इन्सान अंदर धंस सकता था और अगर बर्फ़ पक्की है और पहाड का ढलान ज्यादा है तो फ़िसलकर कई मीटर नीचे झील मे गिर सकता था । 



पर Trek पूर्ण करना हमारे Leader के लिये एक प्रतिष्ठा का प्रश्न था और हम सब लोग हमारे Leader के प्रति पूर्ण समर्पित थे । क्योकि उन्होने अपने प्रेम से हम सब लोगों के दिल जीते हुए थे । कभी ऐसा भी होता कि सब सारे दिन चलते चलते थक जाते और शाम को टेण्ट लगाने के बाद खाना बनाने की ताकत किसी में नही होती तो हमारा Leader हमारे लिये guides , porters के साथ खाना बनाता और एक एक को टेण्ट मे जाकर खाना देकर आता ।
 हमारा Leader सबसे अच्छा पर्वतारोही होने पर भी सबसे पहले पहुँचकर अपने अहं को संतुष्ट करने के बजाय सबसे पीछे चलता ताकि कोई कमजोर सदस्य पीछे ना छूट जाये और विकट रास्ते मे जब कोई अकेला रह जाता है तो हिम्मत हार जाता है इसलिये हमारा leader सबसे पीछे चलता सबको साथ लेकर चलता था ।


हकलाहट के मामले हम देखते हैं कई बार किसी workshop या SHG Meet मे कोई थोडा सा ज्यादा Fluent PWS आकर बोलना शुरू करता है तो रूकने का नाम ही नहीं  लेता , पर इससे सिर्फ़ अहं की संतुष्टी ही मिल सकती है, Leader वह है जो औरों का उत्साहवर्धन करे ।

 हमारे Leader ने निश्चय किया कि जहाँ  तक जाना संभव होगा,  चलेंगे और जहाँ समस्या आयेगी पूरा group वापस लौट आयेगा । हमने डोढिताल से चढाई शुरु की , पहाडो, पत्थरो , झरनो को पार करते हुए हम उस एक चोटी पर सुस्ताने लगे क्योकि एक और पहाड़ रह गया था जिसके बाद हम उस दिन टेंट लगा सकते थे और रात्री विश्राम कर सकते थे । सुस्ताने के बाद जैसे ही हमने पहाड़ की चोटी पार की;  सामने का नजारा दिल दहलाने वाला था , जो पहाड़ हमें पार कर टेंट के लिये समतल जगह तक जाना था
उस 30 दिग्री ढलान वाले पहाड़  पर तो ऊपर से लेकर नीचे तक बर्फ़ ही बर्फ़ जमीं हुई थी ।
 उस नजारे को देखकर वो group members भी डर गये जो लगातार 16 सालों से अमरनाथ यात्रा पर जा रहे थे । फ़ैसला हुआ कि पहले गाईड चल कर देखेगा कोइ खतरा तो नही है । गाईड ने 9-10 कदम चल कर देखा तो बोला - बर्फ़ कच्ची है पैर कुछ 10-15cm  अंदर धंसेगे, पर फ़िसल कर झील मे नही गिरोगे । 

यहीं  मैं अपने Leader के साथ सबसे पीछे था और एक अजीब बात नोट की, जो जितना ज्यादा बर्फ़ पर फ़िसलने से बच रहा था, शरीर tight कर बर्फ़ पर चल रहा था उसका संतुलन उतना ही ज्यादा  बिगड रहा था और बार बार गिर रहा था । मैं एक क्षण के लिये डरा और फ़िर याद आया क़ डर के आगे ही जीत है । और मैं उस बर्फ़ पर चलने का मजा लेने लगा, एक एक कदम साधकर रखने के बजाय, शरीर को tight करने के बजाय मस्ती से शरीर लचीला कर बर्फ़ पर चलने लगा और आश्चर्य
मैं कभी नही गिरा मेरे हाथ जमीन से कभी नही  टिके । हाँ, 2-3 बार संतुलन बिगडा पर शरीर लचीला कर रखा था सो तुरंत ही संतुलन बना लिया , थोडी देर मे इतना आत्मविश्वास आया कि मैं  जो सबसे पीछे था सबसे पहले गंतव्य पर पहुँच गया था और फ़िर अपना बेग रखकर बीच राह में फ़ॅसे लोगो को सहारा देकर निकालने के लिये दुबारा बर्फ़ के बीच कई बार आया ।
a tough situation during tracking for group, crossings a snow covered mountains

यहाँ  यदि हम बर्फ़ पर चलना और हकलाहट को देखे तो समान अनुभव होगा जितना हकलाने से बचने की कोशिश करते हैं बोलने से संबंधित अंग (जीभ, जबडे, कंठ, vocal cord) कस जाते है, tight  हो जाते है block और ज्यादा बडे होते जाते हैं पर जैसे ही हम हकलाने के लिये तैयार होते है volunteer stuttering करते हैं हकलाहट बहुत कम और नियंत्रित रहती है ।






crossing a fall by holding branches


पहले मैं हर Trek के बाद बीमार पड जाता था , पर इस बार मैं एकदम ठीक था क्योंकि टीसा से जुडने के बाद मैने रोजाना व्यायाम करना शुरू किया, रोजाना व्यायाम करने से शरीर स्वस्थ, सबल होता हैं , stamina बढता हैं और श्वसन प्रकिया मे भी सुधार होता हैं और इन सबसे आत्मविश्वास स्वतः ही बढ जाता हैं । और श्वसन प्रकिया मे सुधार से और आत्मविश्वास बढने से हकलाहट भी घटती जाती है 

5 comments:

Amitsingh Kushwah said...

धन्यवाद हेमन्त जी! बहुत ही रोमांचक और प्रेरणादायी अनुभव आपने साझा किया है। सच में हम हकलाहट के कारण जीवन के सुन्दर पलों का आनन्द लेना ही भूल जाते हैं, हर पल सिर्फ हकलाहट का ही ख्याल आता है कि पहले मैं अपनी हकलाहट को ठीक कर लूं, फिर बाद में दूसरे काम करूंगा। टीसा और टीसा के इवन्ट्स हकलाने वाले व्यक्तियों को जीवन जीने का रास्ता दिखाते हैं और इसमें आकर उन्हें अपने जीवन का महत्व समझ में आता है।

हकलाहट जीवन का अंत नहीं बल्कि एक नई शुरूआत है और आपने अपने यह साबित कर दिया है। हिन्दी में लेखन के लिए बधाई और आभार। आगे भी इसी तरह अपने अनुभव शेयर करते रहें।

abhishek said...

Bahut achcha anubhav share kiya aapne. Bahut mann laga, prerna mili aur barf pe chalne ke liye advice bhi

sachin said...

Good job, Hemant!

Joy deep Majumder said...

Good Hemanth..you inspire us..

we would have to come out of the well of stuttering and add muscles to other aspects of life..passions..their are so many other aspects of a personality than just a clear speech..

Anand said...

Hi Hemant Ji!

आपने ट्रकिंग के अनुभव को हकलाहट के साथ जोड़ने का जो प्रयास किया है वो बहुत ही सराहनीय है।
इसने सच में काफी प्रभावित किया।

अपना अनुभव शेयर करने के लिया आपको बहुत बहुत धन्यवाद्।

Anand