March 9, 2013

रूपान्तरण...

आज सुबह मैरियन बोली- जल्दी बाहर आआो और ये देखो..

फूलों की क्यारी मे एक कोमल सा लाल फूल सुबह की बयार में झूम रहा था - हौले हौले..
कल जो भी हो - आज का दिन और यह सुबह ज़ाहिरन उस नन्हे से फूल की थी..
इक पल को मै जिन्दगी की सारी कड़वाहट भूल गया..सारा यथार्थ जैसे उस छोटे से फूल के सामने नतमस्तक हो..
"ये है क्या आखिर?"
"ये भी नही पता? अरे ये पौपी है, पौपी.."
....
....

"और पता है ये कल तक, कैसा था?"
मैने बड़े गौर से उस के बगल मे उस हरी शाख को देखा जो सिर्फ ऊपर जा रही थी- और ऊपरी छोर पर - मानो शर्म से सिर झुका लिया हो उसने अपने बेमानी वज़ूद पर..

मुझे यक ब यक अपने वोह दिन याद आ गये जब मै अपने जीने के लिये भी शर्मिन्दा था..

अगर हम एक अच्छे माली की तरह हर इन्सान को सुनें और समझें तो यह रूपान्तरण रोज हो सकता है.. यह कोई चमत्कार नही..यह जीवन का सत्य है..

3 comments:

हेमन्त कुमार "हृदय" said...

I agree with you Sachin sir -अगर हम एक हर
इन्सान को सुनें और समझें तो यह
रूपान्तरण रोज हो सकता है.. यह कोई
चमत्कार नही.. It is just a simple process of "Healing". Healing is a natural latent power in man.
Many times we have seen that in treating diseases, the doctor's behavior and use of willpower is more important than mere medication.

jasbir singh said...


Nice write up Dr. Sachin. Here one more thought:

Learn to view your mind like a garden and you will notice a number of weeds about your stammering grown in it.Like weeds in a garden , those in your mind can be removed. But do not forget the growth potential of your mind either.

sachin said...

Thanks Hemant and Jasbir ji. I am trying to flex my Hindi muscles.. and enjoying it..