April 27, 2017

दिल्ली संचार कार्यशाला: एक कदम सपनों को हकीकत में बदलने की ओर . . .



देश की राजधानी नईदिल्ली में द इण्डियन स्टैमरिंग एसोसिएशन (तीसा) की 2 दिवसीय संचार कार्यशाला 22 एवं 23 अप्रैल 2017 को आयोजित की गई। होटल एसपीबी 87 पर हुई इस कार्यशाला में देशभर के 30 प्रतिभागियों ने भाग लिया। प्रतिभागियों में प्रमुख रूप से गरिमा, जगदीश मेवाड़ा, रामनिवास मीणा, ब्रजेश फौजदार, वरूण प्रताप सिंह, साहिल कुमार, गुरूविन्दर सिंह, मोनू ढींगरा, राजू, वृद्धि प्रतिम नियोगी, संजय नेगी, मनीष कुमार, अमित दाहिया, अंकित अवस्थी, मनीष अग्रवाल, राजेन्दर सिंह, रमेश, विजय बघेल, अमित निर्मोही, प्रमोद कुमार यादव, राजीव कुमार, लवमीत सिंह, जितेन्दर कुमार, दीक्षित अरोरा शामिल हैं। कार्यशाला की आयोजक टीम में रमणदीप सिंह, शैलेन्द्र विनायक, आशीष अग्रवाल, सिकंदर सिंह और रवि जग्गा रहे। अतिथि के रूप में अमित सिंह कुशवाह उपस्थित थे।
संचार कार्यशाला की शुरूआत करते हुए आशीष अग्रवाल ने कुछ नियमों के बारे में बताया। जैसे- खुलकर हकलाना, किसी दूसरे हकलाने वाले को बिना मांगे सलाह मत देना, अपनी बारी आने पर ही बोलना। आशीष ने प्रस्तावना रखते हुए तीसा की स्थापना के उद्देश्य एवं कार्यप्रणाली पर प्रकाश डाला। उन्होंने हकलाने वाले साथियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि यह कार्यशाला हकलाना ठीक करने या हकलाहट के क्योर का दावा नहीं करती बल्कि हम हकलाहट के प्रबंधन पर जोर देते हैं। आप सब हकलाते हुए भी एक कुशल संचारकर्ता बन सकते हैं। हकलाहट का कुशल प्रबंधन करना सीखने के लिए ही यह कार्यशाला आयोजित की गई है।
स्वीकार्यता एवं आइसबर्ग पर रवि जग्गा ने प्रकाश डाला। श्री जग्गा ने बताया कि हकलाहट को स्वीकार करने से हम अनावश्यक तनाव, डर और शर्म से बाहर आ सकते हैं। जब हम हकलाहट को स्वीकार करते हैं तो इसका मतलब यह है कि अब हम खुद को जैसे हैं, उसी तरह भीतर से स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना चाहते हैं। आइसबर्ग थ्योरी यानी पानी पर बहती हुई बर्फ की शिला या चट्टान का जिक्र करते हुए रवि जग्गा ने कहा कि हम हकलाहट के आन्तरिक पहलुओं के बारे जान ही नहीं पाते जबकि इन पर काम किया जाना जरूरी है। इस सत्र में स्वैच्छिक हकलाहट यानी खुद जानबूझकर हकलाने से सम्बंधित वीडियो दिखाए गए। इनमें दिखाया गया कि हकलाने वाला व्यक्ति खुद जानबूझकर हकलाकर, हकलाने के डर और शर्म से आजाद हो सकता है।
संचार कार्यशाला में विभिन्न गतिविधयों को व्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए प्रतिभागियों को 6 समूहों में विभाजित किया गया।
जलपान के बाद कार्यशाला के आयोजक रमणदीप सिंह ने प्रोलाॅगंशिएशन तकनीक के बारे में बातचीत की। उन्होंने बताया कि जब आप किसी स्पीच तकनीक का इस्तेमाल करेंगे तो सुनने वाले लोगों की प्रतिक्रिया नकारात्मक भी हो सकती है, इसलिए धैर्य के साथ ऐसी स्थितियों का सामना करना चाहिए। कई बार हकलाने वाला व्यक्ति स्पीच तकनीक का इस्तेमाल करने का संकल्प करना है, लेकिन कुछ ही देर बाद भूल जाता है, और फिर से हकलाने लगता है। उसका ध्यान अपनी बात कहने पर ज्यादा होता है। इसलिए बार-बार अभ्यास करते रहना जरूरी है।
शैलेन्द्र विनायक ने ध्यान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हम अपने दिमाग को शांत करने के लिए ध्यान करते हैं। 2 मिनट अगर हम शांत होकर बैठ जाएं तो हमारे अन्दर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
बाउंसिंग तकनीक के बारे में शैलेन्द्र विनायक ने चर्चा की। चर्चा के दौरान यह प्रश्न उठा कि कोई व्यक्ति बाउंसिंग तकनीक ही क्यों इस्तेमाल करे? प्रोलाॅगंसिएशन तकनीक में क्यों न बोले? इस पर सभी प्रतिभागियों ने अपनी राय दी। निष्कर्ष निकला कि प्रोगाॅसिएशन तकनीक में हम हकलाहट को थोड़ा छिपा रहे होते हैं, जबकि बाउंसिंग में हम खुलकर हकलाकर बोलने का अभ्यास करते हैं। इसलिए बाउंसिंग अधिक साहसिक और संतोषप्रद तकनीक है। इसके बाद सभी लोगों ने मंच पर आकर बाउंसिंग तकनीक में अपना परिचय दिया।
अगले सत्र में सभी लोगों को एक-एक कार्ड दिया गया। इस कार्ड में यातायात के संकेत बने हुए थे। सभी प्रतिभागियों ने स्पीच तकनीक का इस्तेमाल करते हुए दिए गए यातायात संकेतकों का वर्णन किया।
शैलेन्द्र विनायक ने थकान दूर करने के लिए एक शारीरिक गतिविधि करवाई। कूदो, नाचो, कूदो और बैठो, खड़े हो, बैठो। इस गतिविधि से लोग तरोताजा हो गए।
पाॅजिंग तकनीक पर गरिमा ने प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बोलते समय अपना मुंह अधिक से अधिक खोलकर बोलना चाहिए। पाॅजिंग सबसे आसान तकनीक है। इससे रूकावट कम हो जाती है, बोलने की गति सामान्य हो जाती है। वाणी में प्रवाह आ जाता है। सुनने वाला व्यक्ति हमारी बात सुनने के लिए आकर्षित होता है। हमें अर्धविराम पर 5-6 सेकंड तक और पूर्णविराम पर 10 सेकण्ड तक रूक चाहिए।
इसके बाद आॅई कान्टेक्ट (आंखों से सम्पर्क) पर आशीष अग्रवाल ने विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आॅई कान्टेक्ट हमारे संवाद का एक जरूरी अंग है। एक प्रभावी संचारकर्ता के लिए आॅई कान्टेक्ट बहुत उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है।
इसके बाद गरिमा ने बाॅडी लैग्वेज (शारीरिक भाषा) पर प्रतिभागियों से चर्चा की। गरिमा ने कहा कि शारीरिक भाषा हमारे आत्मविश्वास को प्रदर्शित करती है। दूसरे लोग प्रभावपूर्ण तरीके से हमारे संचार पर ध्यान देते हैं। इसके लिए चेहरे, कंधे और हाथ-पैर के साथ ही हाव-भाव पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। बात करते समय थोड़ा मुस्कुराना चाहिए। अपने मन को हमेशा शांत रखें, प्रणायाम करें और स्वास्थ्य पर भी ध्यान दें। इन सबका हमारे संचार पर सीधा असर पड़ता है। खुद को प्रेरित करें और हमेशा सकारात्मक रहें।
गरिमा ने आगे बताया कि आपको हकलाते हुए भी अच्छा हाव-भाव बनाए रखना चाहिए। अपने शरीर को मुक्त करके रखना चाहिए, जकड़कर नहीं। साथ ही हाव-भाव को विषय के अनुसार प्रदर्शित करना चाहिए। एक ही जगह खड़े न रहकर चलते हुए बोलना, सुनने वालों की तरफ आॅई कान्टेक्ट रखना चाहिए। हमारी 70 से 90 प्रतिशत तक हकलाहट शारीरिक भाषा पर काम करने से ठीक हो सकती है।
कार्यक्रम में विशेष अतिथि अमित सिंह कुशवाह ने कहा कि स्वीकार्यता में जीवन की समग्रता समाहित है। स्वीकार्यता का मतलब है जीवन में अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाना। आज हर व्यक्ति कभी न कभी हकलाता है, धाराप्रवाह बोलना हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं। हकलना भी बोलने का एक तरीका है।
दोपहर के भोजन के बाद सवाल-जबाव का सिलसिला शुरू हुआ। इसमें एक प्रतिभागी सामने मंच पर आया और बीच में बैठे हुए एक प्रतिभागी ने कोई भी सवाल पूछा। जब 20 साल के संजय नेगी मंच पर आए तो उनसे एक सवाल पूछा गया- हकलाहट के हानि या लाभ क्या हैं? संजय ने उत्तर दिया- फोन की जगह एसएमएस या व्हाट्सएप कर देना, सामाजिक मेल-मिलाप कम हुआ है हकलाहट के कारण। हकलाने का लाभ यह है कि मैंने बहुत कुछ जानने का प्रयास किया है।
गरिमा ने वृद्धि प्रतिम नियोगी से पूछा- आपने हकलाहट से क्या सीखा?
श्री नियोगी ने कहा- हकलाने के कारण मेरा मनोबल मजबूत हुआ है। पहले मैं एकदम चुप रहता था, आज मैं एक पूर्ण व्यक्ति बनने की ओर अग्रसर हूं।
अगले सत्र में कुछ प्रेरणाप्रद वीडियो दिखाए गए। इनसे यह सीख मिली की हकलाहट हमारे जीवन में कभी भी बाधा नहीं बन सकती। हकलाने वाले व्यक्ति हर क्षेत्र कार्य कर सकते हैं।
फिर एक गतिविधि हुई। सभी ने अपनी नोटबुक पर धन्यवाद सूची बनाई। हमारे जीवन में कई लोगों ने हमारी मदद की, हमें आगे बढ़ाया, उन सबके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करना था। प्रतिभागियों की सूची में किसी ने 10 तो किसी ने 22 बिन्दु शामिल किए। सबसे लम्बी धन्यवाद सूची बनाने वाले प्रतिभागी को सम्मानित किया गया।रमणदीप सिंह ने लक्ष्य निर्धारण पर अपना प्रस्तुतिकरण दिया। उन्होंने बताया कि हमें हकलाहट का कुशल प्रबंधन करने के लिए छोटे-छोटे लक्ष्य बनाकर निरंतर अभ्यास करना होगा, तब हम एक कुशल संचारकर्ता बन पाएंगे।
पहले दिन का समापन एक रोचक गतिविधि से हुआ। सभी प्रतिभागियों को एक-एक पर्ची दी गई। उस पर्ची में आसपास के किसी व्यवसायिक प्रतिष्ठान या दुकान का नाम व पता लिखा था। प्रत्येक व्यक्ति को पूछताछ करते हुए जाना था और किसी स्पीच तकनीक या खुलकर हकलाकर बोलना था और उस स्थान पर जाकर एक सेल्फी लेकर वापस पास के शास्त्री पार्क पर आना था। इस प्रकार सभी अपनी पर्ची पर दिए गए पते की खोज करने के लिए निकल पड़े। लगभग एक घण्टे बाद प्रतिभागी शास्त्री पार्क पहुंचे और वहां पर अपने अनुभव साझा किए। एक अनजान शहर में अनजान लोगों से पता पूछना, सभी के लिए रोचक अनुभव रहा।
दूसरे दिन की शुरूआत में तीसा के कुछ रोचक वीडियो दिखाए गए जिसमें स्वीकार्यता और स्पीच तकनीक के बारे में सभी को जानकारी मिली। इसके बाद पहले दिन की गतिविधियों को दोहराया गया। फिर सबने जलपान किया।
जगदीश मेवाड़ा ने एक सुंदर बात कही- जब हम दूसरे किसी काम को करने में जोर नहीं लगाते जैसे- पेन उठाना, पैर उठाना, हाथ उठाना, उसी तरह हमें बोलने में भी जोर नहीं लगना चाहिए, प्यार से हकलाना चाहिए।
संजय नेगी ने कहा- मैं खुद की हकलाहट को स्वीकार करता हूं, लेकिन खराब संचार को नहीं स्वीकार करता। इसलिए हमें एक कुशल संचारकर्ता बनने के लिए मेहनत करना चाहिए। मेरा मानना है कि बहुत अच्छी सोच रखने से बेहतर है थोड़ा सा कोई अच्छा काम करना। यह कार्यशाला इसलिए सफल है क्योंकि यह हकलाहट को क्योर करने का झूठा दावा नहीं करती। यह मंच हमें सच का सामना करने की प्रेरणा देता है।
रमेश ने कहा- हकलाहट के कारण मुझे नई चीजें सीखने का मौका मिला। मैंने कई धर्मग्रंथ पढ़े और उन पर चिन्तन-मनन किया। इससे मेरे जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है।
इसके बाद प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए।
फिर एक चुनौतीपूर्ण गतिविधि आयोजित की गई। इसमें एक प्रतिभागी ने मंच पर आकर किसी भी विषय पर बोला और बाकी सब सुनने वाले प्रतिभागियों ने उसकी वाणी, हकलाहट, हाव-भाव, विषय वस्तु का मजाक बनाया। इससे वक्ता को धैर्य के साथ बोलने और अपमानजनक परिस्थितियों में साहस बनाए रखने की प्रेरणा मिली।
अगले सत्र में शैलेन्द्र विनायक ने नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) के बारे में चर्चा की। उन्होंने बताया कि ध्यान का पहला सूत्र है शरीर की शु़िद्ध। खुद को स्वस्थ्य बनाए रखने के लिए ध्यान बहुत लाभकारी है।
एक और बाहरी रोचक गतिविधि की गई। इस गतिविधि में सभी 6 समूहों को आसपास के होटल में जाकर एक काल्पनिक कार्यक्रम आयोजित करने के सम्बंध में बातीचत करनी थी और इवेन्ट का कोटेशन लेना था। इस गतिविधि में किसी समूह ने 5 से किसी समूह ने 15 होटल के कोटेशन प्राप्त किए।दोपहर के बाद सभी लोगों ने पिछली गतिविधि पर अपने अनुभव साझा किए। एक प्रतिभागी ने कहा- होटल के स्वागत काउन्टर पर बैठे कर्मचारियों में बड़ा धैर्य होता है, वे हमारी बात को ध्यान से सुनते हैं। विजय बघेल ने बताया- हमारा समूह 5 होटल में गया। वापस आते समय एक शेरवानी का बड़ा शोरूम था। पहले हमें डर लगा कि इतने बड़े शोरूम में जाने पर कहीं कोई गड़बड़ न हो जाए। आखिरकार हम लोगों ने सोचा जो होगा देखेंगे। हम 5 साथी शोरूम में चले गए। मेरे साथियों ने पहले ही योजना बना ली थी, मुझे दुल्हा बनाने की। साथियों ने कहा- ये हमारे दोस्त हैं, इनकी शादी है, शेरवानी दिखाईए। यह एक बहुत आलीशान शोरूम था। हम पहले तल पर गए। वहां पर शोरूम के कर्मचारी ने कई महंगी शेरवानी दिखाई। अंत में एक शेरवानी मैंने पहनकर देखा। दूल्हे की तरह मुझे उस कर्मचारी ने सजाया। फिर बोला- यह पूरा सेट 28,000 का पड़ेगा। हम लोगों कहा- ठीक है। हम लोग कल आएंगे, आॅर्डर देने। इस प्रकार यह बहुत साहसिक अनुभव रहा।
फोन पर बातचीत करने के अनुभव को जानने के लिए एक गतिविधि की गई। इसमें सभी प्रतिभागियों ने मंच पर आकर किसी अनजान व्यक्ति से बातचीत अपने किसी कठिन शब्द के साथ। अधिकतर लोगों ने दिल्ली मेट्रो के स्टेशन पर फोन कर ट्रेन की जानकारी ली, तो किसी ने बीमा एजेन्ट बनकर अनजान नम्बर पर फोन किया। इससे सभी ने सीखा कि फोन पर बातचीत कैसे करनी है और सुनने वाला व्यक्ति अपना धैर्य खोता है या नहीं, यह जानना अच्छा अनुभव था।
तीसा के वरिष्ठ सदस्य एवं सहयोगी सिंकदर सिंह ने ध्यान पर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि हम सोचना बंद नहीं कर सकते। हम दिन-रात सोचते रहते हैं। हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही हम महसूस करते हैं। ध्यान हमें सिखाता है कि हमेशा सकारात्मक सोचो, अच्छा सोचो, बेहतर करो।
दिल्ली के ही जितेन्दर गुप्ता ने बताया कि तीसा से जुड़ने बाद उनके अन्दर कई गुणों का विकास हुआ। जैसे- बैठक आयोजित करना, फोन पर बातचीत करना और जिम्मेदारी उठाना। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद एक बिजली कम्पनी में नौकरी लग गई। मेरा काम था बिजली चोरी को पकड़ना और उस पर कार्यवाही करना। यह हकलाने वाले व्यक्ति के लिए एक कठिन कार्य है। लेकिन मैंने यह बहुत ही साहस के साथ किया और कम्पनी के अधिकारियों के विश्वास पर खरा उतरा।
आखिरी में नाटक मंचन की गतिविधि आयोजित की गई। इसमें 4 ग्रुप में 4 नाटक मंच पर खोले गए। सभी नाटकों में हकलाहट को जरूर शामिल किया गया। नाटकों में इण्डियन आॅईडल का आडीशन, बस में महिला-पुरूष के बीच नोकझोंक, हवाई यात्रा के दौरान एक यात्री का हंगामा और स्कूल में क्लास रूम, टीचर और बच्चों के बीच संवाद। ये सभी नाटक बहुत ही रोचकता के साथ खेले गए।
अंत में प्रतिभागियों ने संक्षिप्त में बताया कि इस कार्यशाला में आकर हकलाहट के बारे में उनका व्यावहारिक ज्ञान बढा है और वे यहां से जाने के बाद हकलाहट के प्रबंधन पर कारगर तरीके से कार्य करेंगे।
सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद और ढेरों शुभकामनाएं।
फिर मिलेंगे…


AMITSINGH KUSHWAHA

1 comment:

Ravi Kant Sharma said...

बहुत ही बढ़िया तरीके से कार्यशाला का वर्णन किया है। अमित आप बहुत बढ़िया लिखते है। और कार्यशाला तो बढ़िया होनी ही थी। जहाँ दिल्ली का समूह हो वहाँ तो धमाल तो होगा ही। लेख को पढ़ कर मैंने बहुत कुछ सीखा और उसे नोट भी किया।