May 16, 2016

हकलाहट पर वर्क करना नई भाषा सीखने जैसा है!


एक विज्ञापन : 60 घंटों में अंग्रेजी बोलना सीखें। 100 प्रतिषत गांरटी के साथ।

असर : अंग्रेजी बोलना सीखने की चाह रखने वाले कई युवा इस तरह के विज्ञापन में किए गए दावों से आकर्षिक होकर इंग्लिष कोचिंग जाना शुरू करते हैं। कई बार, कई सालों तक और कई कोचिंग सेन्टर पर जाकर अंग्रेजी सीखने का प्रयास जारी रखते हैं।

परिणाम : पहली बात तो यह की 60 घंटों की कोचिंग लेकर कोई भी युवा धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलना सीख नहीं पाता। धन और समय की बर्बादी होती है, सो अलग।


कारण : जब हम कोई नई भाषा बोलना सीखना चाहते हैं, तो बार-बार उसका इस्तेमाल करना जरूरी है। अपने दैनिक जीवन में लगातार उसका प्रयोग करना चाहिए। दुर्भाग्य से कहीं कुछ गलती न हो जाए, ग्रामर में कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए, इस डर से कई युवा अपने कॉलेज, आफिस या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर अंग्रेजी बोलने से बचते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि भाषा का उद्देष्य संचार में सहायता करना है। चाहे आप बहुत गलत अंग्रेजी बोल रहे हों, लेकिन यदि सुनने वाला व्यक्ति आपकी बात को ठीक तरह से समझ पा रहा है, तो इसका मतलब है कि आपका संचार/संवाद सफल हुआ। दुर्भाग्य से हमारे समाज में गलत हिन्दी बोलने पर कोई रोक-टोक नहीं की जाती, कोई शर्म महसूस नहीं करता, लेकिन गलत अंग्रेजी बोलने से पहले 100 सौ बार सोचते हैं। ऐसा हमारे मन में भाषा को लेकर पूर्वाग्रह के कारण है, जो की सही एवं तर्कसंगत नहीं है।
 
हकलाहट बनाम नई भाषा सीखना
 
1.    जिस प्रकार हम अंग्रेजी या कोई नई भाषा बोलना सीखते समय ढेरों गलतियां करते हैं, उसी तरह हकलाहट पर कार्य करते समय भी गलतियां होना, बार-बार हकलाना स्वाभाविक है। आप अपने घर में कमरे के अन्दर बैठकर धाराप्रवाह बोलना नहीं सीख सकते हैं। आपको बाहर निकलना होगा बार-बार हकलाने के लिए, बार-बार गलतियां करने के लिए।
2.    नई भाषा हम तभी सीख सकते हैं जब अपने दैनिक जीवन में, कार्यालय में, कॉलेज में और परिवार में बार-बार उसका इस्तेमाल करें। ठीक इसी तरह जब आप हकलाहट पर काम करना शुरू करेंगे तो सभी जगह हकलाहट के बारे में खुलकर बातचीत करना, स्पीच तकनीक का अभ्यास करना, स्वैच्छिक हकलाहट यानी जान-बूझकर हकलाना आदि का प्रयोग करना जरूरी है।
3.    अंग्रेजी या कोई नई भाषा सीखने के लिए बार-बार गलत बोलना, गलत उच्चारण करना एक सामान्य और स्वाभाविक प्रक्रिया है। ऐसे ही हकलाहट पर काम करते समय कई बार हकलाना, विपरीत हालातों का सामना करना सीखना एक सामान्य बातचीत का ही हिस्सा है।
4.    नई भाषा सीखते समय जब आप किसी शब्द को गलत बोलते है, तो उसका सही अर्थ जानना और सही उच्चारण करने की कोषिष करते हैं। इसी तरह जब आप किसी शब्द पर हकलाते हैं, तो बार-बार उस शब्द का सही उच्चारण करने की कोषिष करते हैं, कोई स्पीच तकनीक का प्रयोग कर उच्चारण करते हैं।
5.    नई भाषा सीख सीखने के दौरान जब हम एक-दो शब्द या वाक्य सही बोलते हैं, तो अन्दर से बड़ा सुकून मिलता है, आनन्द आता है। उसी तरह हकलाहट पर वर्क करते समय जब आप किसी शब्द या वाक्य को सही तरीके से बोल पाएं तो उसकी खुषी मनानी चाहिए, सुख का अहसास होना चाहिए।
6.    अंग्रेजी या नई भाषा के प्रति झिझक खत्म करने के लिए हमेषा अनजान लोगों से बातचीत करने की सलाह दी जाती है। ठीक यही बात हकलाहट पर भी लागू होती है। हकलाहट के डर से आजाद होने के लिए अनजान लोगों से लगातार बातचीत करने की कोषिष करते रहना आवष्यक है। तभी आप हकलाहट के डर से आजाद हो पाएंगे।
7.    नई भाषा में प्रभावी संचार के लिए अपने चेहरे के हाव-भाव, आई कान्टेक्ट, हाथेलियां और पैर के सही संचालन पर ध्यान देने की बात कही जाती है, यही सब बातें हकलाहट पर भी लागू होती हैं। एक बेहतर संचार के लिए इन सभी बातों पर गहराई से ध्यान देना सभी के लिए जरूरी है।
8.    नई भाषा आप अपने जीवन में विकास के लिए, सफलता अर्जित करने के लिए, ज्ञान प्राप्त करने के लिए, अधिक से अधिक लोगों बातचीत करने के लिए सीखते हैं। ठीक इसी तरह हकलाहट पर वर्क आप इसीलिए करते हैं, ताकि एक कुषल संचारकर्ता बन सकें।
पते की बात : आप यह सोचना छोड़ की हकलाने पर लोग क्या कहेंगे? महत्वपूर्ण बात तो यह है की खुद के प्रति समर्पित होकर हकलाहट के लिए वर्क करना कब शुरू करेंगे? कब तक इंतजार करते रहेंगे? कब तक तारीख पर तारीख आती रहेगी और आप हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे? सच तो यह है कि हकलाहट पर कार्य करने के लिए किसी मुहूर्त की जरूरत नहीं है, आप तुरंत षुरू कर दें, मुष्किलों का सामना करें और आगे बढ़ें।


Amit SK
09424319968

2 comments:

sachin said...

Very appropriate parallels between language learning and learning to deal with stammering. Becoming a good communicator is a lot more than "avoiding stammering" or "talking with a flow".. Communication is about being in tune with the other person/s. Being in touch with them at a level deeper than words. This is why expert communicators are able to communicate with people speaking a different language- and/ or at times without words. An old couplet about Shankaracharya, a great teacher, goes something like this:
"The teacher is sixteen. The taught is sixty. Not a word was exchanged and yet, the transformation was complete!"
(Writing in English- just to make sure that...)

बहुत सुन्दर - धन्यवाद् , अमित !

Shyam sunder Sharma said...

thank u sirr...