November 16, 2012

ट्रेन का यादगार सफ़र . . . !

देहरादून वर्कशॉप में शामिल होकर वापस लौटते समय हम लोगों ने "मैं हकलाता हूँ" वाला बैच शर्ट पर लगाया था। ट्रेन पर हमारी सामने वाली बर्थ में एक सज्जन अपने परिवार के साथ यात्रा कर रहे थे। वे हम लोगों को बाउंसिंग में बात करते हुए ध्यान से सुन रहे थे, लेकिन उन्होंने हमसे इस बारे में कुछ नहीं पूंछा। फिर मैंने पहल करते हुए बताया की हम लोग हकलाते हैं, और देहरादून में हकलाहट पर आयोजित एक वर्कशॉप में शामिल होकर वापस लौट रहे हैं। 

बातों का सिलसिला आगे बढ़ा। पता चला की वे सज्जन पेशे से टीचर हैं। हम सब लोगों ने उन्हें अपना परिचय दिया। इसके बाद हकलाहट, और हकलाहट की स्वीकार्यता के बारे में भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने हमें बताया की उनके आसपास हल्दवानी में भी 2-3 लोग हकलाते हैं, क्या आप उनकी मदद कर सकते हैं? इस पर मैंने उन्हें हल्दवानी के अजय जोशी का फोन नम्बर दिया।


मुरादाबाद स्टेशन पर मुझे, राकेश, सुबोध और डॉ विजय को तेज से खुलकर हकलाने पर बहुत आनंद आया। आगे लखनऊ के पास ट्रेन पर एक व्यक्ति ने "मैं हकलाता हूँ" वाला बैच देखकर मुझसे पूंछा की यह क्या है भाई? मैंने उन्हें बताया की मैं हकलाता हूँ और हम सब लोग देहरादून से हकलाने वालों की कार्यशाला से लौट रहे हैं। हमारा एक संगठन हैं "टीसा". उन्होंने से प्रश्न किया किया की क्या सरकार इस संगठन को धन देती है। मैंने जानकारी दी की नहीं, सरकार कोई आर्थिक सहयोग नहीं देती है। इसमें हम सब हकलाने वाले लोग शामिल है, हम लोग खुद ही सारा इंतजाम करते हैं। इसके संस्थापक डॉ सचिन श्रीवास्तव हैं।         


मैंने उन्हें बताया की हकलाहट का कोई इलाज नहीं है, क्योकि यह कोई बीमारी नहीं है। और इलाज उस रोग का होता है जिसका कोई कारण पता हो। हकलाहट का कोई साफ़ कारण अब तक खोजा नहीं जा सका है। हाँ, हम अपने संचार कौशल पर कार्य करके हकलाते हुए भी एक अच्छे वक्ता बन सकते हैं, लोगों को अपनी बात समझा सकते हैं और उनका फीडबैक ले सकते हैं। वह भी बिना किसी शर्म, संकोच या तनाव के। इसके लिए पहले हम खुद स्वीकार करते हैं की हम हकलाते हैं, हकलाना कोई बुराई नहीं है। 

इसके बाद हम बोलने के लिए कुछ ख़ास तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। इसी क्रम में मैंने कुछ मिमिक्री करके सबको हंसाया और सभी ने तारीफ़ की। उसी समय डॉ विजय सिंह ने जोर से कहा की "मैं हकलाता हूँ"। यह सुनकर एक सीनीयर सिटीजन बोल पड़े - "इन लोगों में कितना ज्यादा आत्मविश्वास है जो खुद ही खुलकर कह रहे है की हकलाते हैं। निश्चित तौर पर इनके अन्दर बहुत सारी प्रतिभा हैं।" फिर सबने हम लोगों के आत्मविश्वास के प्रसंशा की। 

इस बातचीत के बाद हमें दिल से बहुत खुशी हुई। अगर हमारे पास "मैं हकलाता हूँ" वाला बैच नहीं होता तो हम इतने सारे लोगों से हकलाहट के बारे में खुलकर बात नहीं कर पाते। देहरादून की कार्यशाला और ट्रेन का यह यादगार सफ़र मेरे मानस पटल पर हमेशा अंकित रहेगा, क्योकि इसने मुझे दी है "वजह मुस्कुराने की"...   
       
- अमित श्रीवास्तव, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश। 

3 comments:

sachin said...

Thnak you Amit S and THANK you Amit K! Good team work! Keep up this spirit in life- laugh and make people laugh with you..You have stage talent..Keep developing it..

jitendra nimbekar said...

Dear Amit big pat for showing tremendous courage. we got to learn so much from your positive attitude. keep it up and as Sachin sir said keep sharpen your acting skill...you have this knack.

Hemant K-Kumar said...

amit s.
Hats off to you for showing tremendous courage and for sharing information that how you have made "Optimum" use of TISA locket (चमत्कारी ताबीज )